प्रियंका गांधी को मुस्कराहटों के साथ, सधा हुआ कटाक्ष करने की कला ख़ूब आती है

प्रियंका गांधी की राजनीतिक शैली, उनकी संवाद कला और सौम्य कटाक्ष की क्षमता पर यह विश्लेषण बताता है कि भारतीय राजनीति में उनका व्यक्तित्व कैसे एक अलग प्रभाव और नई बहस पैदा करता है।

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सुशोभित

प्रियंका गांधी की ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ बहुत मज़बूत है। उन्हें कभी आपा खोते या असहज होते नहीं देखा। मुस्कराहटों के साथ, सधा हुआ कटाक्ष करने की कला उन्हें ख़ूब आती है। और तब उनके तीर निशाने पर लगते हैं और सामने वाले को लाजवाब कर देते हैं। उनकी तुलना में राहुल थोड़े तल्ख़ और नाराज़-स्वर वाले हैं। स्वाभाविक भी है। जितना अपमान उन्होंने झेला, जितनी हार का सामना करना पड़ा- हाल के सालों में शायद ही किसी और राजनेता ने किया हो। लेकिन राजनीति में अगर आगे चलकर गठबंधन-धर्म का निर्वाह करना पड़ा तो राहुल-शैली के बजाय प्रियंका-शैली ज़्यादा कारगर होगी। अटल जी के सौम्य व्यक्तित्व का भारतीय जनता पार्टी को कितना लाभ मिला था, इतिहास में दर्ज़ है। “सौम्य मुस्कराहट के साथ कटाक्ष करने वाली स्त्री” : संघ-परिवार के पास इस बात की हरगिज़ मनोवैज्ञानिक ट्रेनिंग नहीं है कि इसका सामना कैसे किया जाए। आप अगर तीखी राजनैतिक टिप्पणी करेंगे तो वो डेढ़ गुना तल्ख़ी के साथ जवाब में हुँकार भरेंगे। आकाश गुँजाने वाला नारा बुलन्द करेंगे। धर्म और राष्ट्र और संस्कृति पर ये आठों पहर व्याख्यान दे सकते हैं। पर इन्हें बिलकुल नहीं पता कि विट् (वाक्-चातुर्य) से भरी एक बुद्धिमान, आत्मविश्वस्त और सहज स्त्री से कैसे डील करें।

(प्रसंगवश, भारत-राष्ट्र को ‘माँ भारती’ या ‘मदरलैंड’ या स्त्री को ‘माता-बहन-बेटी’ के रूप में ही देखने, सम्बोधित करने के पीछे- मनोविज्ञान संकेत करता है- एक गहरी रूढ़ि हो सकती है। यह कि भीतर कोई ऐसी पाशविक वृत्ति है, जो उबल रही है और जिसका दमन करने के लिए स्त्री को ‘माता-बहन-बेटी’ के रूप में ‘डी-सेक्शुअलाइज़’ करने की ज़रूरत लगातार महसूस होती है, जैसे स्त्री का इसके सिवा कोई परिचय नहीं, अस्तित्व नहीं। ‘नारी शक्ति वन्दन’!) जबकि स्त्री वन्दना नहीं, संवाद करने के लिए है, मैत्री करने के लिए है और अगर उसकी सहमति हो तो प्रेम करने के लिए है। वन्दना तो निष्प्राण मूर्तियों की की जाती है, स्त्री तो एक धधकता हुआ जीवन है! कल जब इसी ‘नारी शक्ति वन्दन’ पर चर्चा करते हुए प्रियंका ने संसद में कहा कि “बार-बार बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएँ झट-से पहचान लेती हैं!” तो जैसे तीर सीधे निशाने पर लगा। बग़लें झाँकने के अलावा इसका कोई उत्तर सत्तापुंज के पास नहीं हो सकता था।

“महिला आरक्षण के विचार की शुरुआत भी नेहरू नाम के ही एक व्यक्ति ने की थी, लेकिन घबराइये नहीं, ये वो वाले नेहरू नहीं हैं, जिनसे आप इतना कतराते हैं। ये तो मोतीलाल नेहरू थे”- कथन की यह शैली देखते हैं? जिस अंदाज़ में यह बात कही गई, उसे परखते हैं? ‘नायब-सद्र’ को हमने कम ही हँसते-मुस्कराते हुए देखा है, लेकिन जब प्रियंका ने कहा कि “गृह मंत्री जी हँस रहे हैं, पूरी योजना जो बना रखी है। चाणक्य अगर आज जीवित होते तो वो भी चौंक जाते” तो न केवल सदन में ठहाके गूँजे, बल्कि शाह साहब भी निरुपाय होकर हँस ही पड़े। राजनैतिक संवाद की यह शैली अधिक मारक, स्वीकार्य और दूरगामी प्रभाव वाली है। नितिन गडकरी से तो प्रियंका ने कुछ इस अंदाज़ में सार्वजनिक मनुहार की थी कि उन्हें उसी दिन उनका काम निबटाने को विवश होना पड़ा और वह भी पूरी तरह से सहज होकर। प्रियंका अपने इस विशिष्ट व्यक्तित्व के चलते समकालीन राजनीति में एक फ़र्क़ रंग और स्वर और आस्वाद लेकर आती हैं, इसकी अभी बहुत ज़रूरत भी है। अमरीका में लगातार दो महिला उम्मीदवारों- हिलेरी और कमला- को नकारकर मतदाताओं ने डॉनल्ड को चुना और नतीजा आप देख रहे हैं। किन्तु हाल के सालों में दुनिया में क्लॉदिया शेनबॉम, जसिंडा अर्दर्न जैसी नेत्रियों ने उम्मीदें भी जगाई हैं। भारत ने इंदिरा के बाद से कोई महिला प्रधानमंत्री नहीं देखी है। प्रियंका से हमें बड़ी आशाएँ हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।