
रंजन सिन्हा
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ समय से जिस तेजी से सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, उसे देखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का खुद मैदान में उतरना सामान्य राजनीतिक गतिविधि भर नहीं माना जा सकता। यह संकेत है कि जदयू नेतृत्व अब किसी भी संभावित चुनौती को संगठन और जनाधार के स्तर पर सीधे जवाब देने की तैयारी में है। आनंद मोहन का प्रभाव केवल एक नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि राजपूत समाज के एक बड़े वर्ग में उनकी पहचान और स्वीकार्यता रही है। ऐसे में यदि वे सक्रिय राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाते हैं, तो इसका असर कई क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि नीतीश कुमार खुद सामाजिक समूहों, कार्यकर्ताओं और नेताओं से लगातार संवाद बढ़ा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह लड़ाई केवल दो नेताओं की नहीं, बल्कि प्रभाव, जनाधार और भविष्य की राजनीतिक विरासत की भी है। जदयू यह संदेश देना चाहती है कि बिहार में उसकी राजनीति किसी एक चेहरे या जातीय समीकरण पर निर्भर नहीं है, जबकि आनंद मोहन समर्थक मानते हैं कि उनकी लोकप्रियता अब भी एक बड़ी राजनीतिक पूंजी है। फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलेगा। नीतीश कुमार का सीधे मैदान में उतरना इस बात का संकेत है कि वे किसी भी चुनौती को नजरअंदाज करने के बजाय उसका राजनीतिक जवाब देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

