
डेस्क: गंडिकोटा क़िले के भीतर दाख़िल होते ही ज़्यादातर लोगों की नज़र विशाल फ़सीलों, तोपों और पेन्नार नदी की ख़ूबसूरत वादी पर जाती है। लेकिन अगर आप क़िले के अंदर थोड़ा आगे बढ़ें, तो एक ऐसी इमारत सामने आती है जो बरबस आपको रुकने पर मजबूर कर देती है। यह है गंडिकोटा की चारमीनार मस्जिद। पहली नज़र में इसे देखकर आपको हैदराबाद के चारमीनार की याद आ सकती है, लेकिन यह उसकी नकल नहीं बल्कि दक्खिनी वास्तुकला की अपनी एक अलग पहचान है। इसके चारों कोनों पर बनी मीनारें ही इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं, जिनकी वजह से इसे चारमीनार मस्जिद कहा जाने लगा।
सत्रहवीं सदी की शुरुआत में जब गंडिकोटा पर गोलकोंडा के क़ुतुबशाही सुल्तानों का असर बढ़ा, तब क़िले के भीतर कई नई इमारतें तामीर कराई गईं। इतिहासकारों का मानना है कि इसी दौर में इस मस्जिद का निर्माण हुआ। यह वह ज़माना था जब गंडिकोटा सिर्फ़ एक क़िला नहीं, बल्कि दक्खिन की सियासत का एक अहम मरकज़ था। फ़ौजें आती-जाती थीं, सौदागर ठहरते थे और शाही अफ़सर यहीं से इलाक़े का इंतिज़ाम संभालते थे।
आज इस मस्जिद की दीवारों पर वक़्त के निशान साफ़ दिखाई देते हैं, लेकिन इसकी बनावट अब भी अपने दौर की शान बयां करती है। पत्थरों पर की गई नफ़ीस कारीगरी और मीनारों का संतुलन यह बताता है कि इसे सिर्फ़ इबादत के लिए नहीं, बल्कि एक ख़ूबसूरत यादगार के तौर पर भी तामीर किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि इसी क़िले में कुछ दूरी पर एक प्राचीन हिंदू मंदिर भी मौजूद है। दोनों इमारतें सदियों से एक ही आसमान के नीचे खड़ी हैं। शायद यही गंडिकोटा की असल कहानी है सल्तनतें बदलीं, हुक्मरान बदले, मगर पत्थरों में दर्ज इतिहास आज भी अपनी जगह क़ायम है।

