अगर जीवन में सचमुच आगे बढ़ना है, तो अपनी “डाल” खुद तोड़नी होगी…!

आईएएस अधिकारी रमेश घोलप की प्रेरक कहानी बताती है कि सफलता पाने के लिए सुविधा, डर और सीमित सोच की ‘डाल’ स्वयं तोड़कर नई उड़ान भरना आवश्यक है।

News Aroma
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रमेश घोलप                                                                                                                                                                              एक राजा दो गरुड़ के बच्चे लेकर आया। उसने एक गरुड़ को अपने हाथ पर बैठाया, हल्का-सा इशारा किया और वह क्षण भर में आसमान की असीम ऊँचाइयों में उड़ने लगा।लेकिन दूसरा गरुड़ अपनी डाल पर बैठा रहा। न वह हिला, न उड़ने की कोशिश की।राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि “जो इस गरुड़ को उड़ने के लिए प्रेरित करेगा, उसे स्वर्ण मुद्राओं से सम्मानित किया जाएगा।”
अनेक विद्वान आए, अनुभवी लोग आए, तरह-तरह के प्रयास हुए, लेकिन गरुड़ अपनी डाल छोड़ने को तैयार नहीं हुआ।कुछ दिनों बाद एक साधारण किसान राजदरबार में पहुँचा। उसने अनुमति माँगी और कुछ ही क्षणों में लौट आया।राजा ने ऊपर देखा तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। वही गरुड़, जो उड़ने को तैयार नहीं था, अब पहले गरुड़ से भी अधिक ऊँची उड़ान भर रहा था।
राजा ने किसान से पूछा, “तुमने ऐसा क्या किया?” किसान मुस्कुराया और बोला“महाराज, मैंने केवल वह डाल तोड़ दी, जिस पर बैठकर वह स्वयं को सुरक्षित समझ रहा था। डाल टूटी तो उसे अपनी शक्ति का एहसास हुआ और उसने उड़ना शुरू कर दिया।”
यही कहानी हमारे जीवन की भी है।हममें से अधिकांश लोग किसी न किसी “डाल” से बँधे रहते हैं—किसी के लिए वह सुरक्षित नौकरी है, किसी के लिए पारिवारिक व्यवसाय, किसी के लिए सुविधा का दायरा और किसी के लिए असफलता का डर।धीरे-धीरे वही डाल हमारी पहचान बन जाती है। हम यह भूल जाते हैं कि हमारे भीतर भी एक गरुड़ है, जो अनंत आकाश में उड़ने की क्षमता रखता है।
जीवन केवल नौकरी पाने, घर बनाने, बच्चों को बड़ा करने, उनकी शादी कराने और फिर सेवानिवृत्त हो जाने का नाम नहीं है।जीवन का अर्थ अपनी क्षमता को पहचानना, अपने सपनों को जीना और अपनी सीमाओं को तोड़ना है।याद रखिए कि आपकी डाल कोई और नहीं तोड़ेगा। अगर आपको नई ऊँचाइयाँ छूनी हैं, तो सुविधा, डर, संकोच और सीमित सोच की उस डाल को आपको स्वयं ही तोड़ना होगा, क्योंकि जब तक हम सुरक्षित सहारों से चिपके रहते हैं, तब तक हम अपनी असली उड़ान कभी नहीं भर पाते।
दुनिया बहुत बड़ी है, अवसर असीम हैं और आपकी क्षमता आपकी कल्पना से कहीं अधिक है।और यदि आप स्वयं अपनी उड़ान नहीं भर पाए, तो कम-से-कम अपने बच्चों के पंख मत बाँधिए।उन्हें सपने देखने दीजिए,उन्हें जोखिम उठाने दीजिए,उन्हें अपनी मंज़िल चुनने दीजिए। ज़रूरत पड़े तो उनकी उड़ान रोकने वाली “डाल” भी आप ही तोड़ दीजिए।यकीन मानिए, जिस दिन वह डाल टूटेगी, उसी दिन एक नई उड़ान शुरू होगी… और वही उड़ान किसी साधारण इंसान को असाधारण बना देती है।
याद रखिए-“सुरक्षा हमें जीवित रख सकती है, लेकिन केवल साहस ही हमें ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।”
लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।

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