
संजय कृष्ण
रांची : चाय की पत्तियां एक बार फिर जीवन में स्वाद घोल सकती हैं। गुमला और हजारीबाग में एक बार फिर से सरकार पायलट प्रोजेक्ट के तहत प्रयास कर रही है। हजारीबाग में काम शुरू हो गया है। नामकुम का पुराना दौर लौट सकता है। उसकी पहचान एक बार फिर चाय की खेती से बन सकती है। कहना न होगा, हमारी स्मृतियों में नामकुम चाय बागान की स्मृतियां एकदम ताजी हैं। यहां के चाय बागान में अब बस्ती आबाद हो गई है, लेकिन नाम आज भी रह गया है। यहां हाल-हाल तक खेती होती थी। फिर नामकुम ही नहीं, कई और क्षेत्र थे, जहां चाय की पैदावार होती थी। 1966 में 12 चाय बागान का जिक्र मिलता है, जिसमें काम करने वाली पांच सौ से अधिक महिला श्रमिक थीं। ये सभी आदिवासी महिलाएं थीं। नामकुम से लेकर महिलौंग और गेतलसूद तक पूरा इलाका ही चाय की खेती के लिए प्रसिद्ध था।
पहली बार 1839 में रांची में उगी थी चाय
रांची में चाय की खेती की बात करें तो 1839 में रांची में गवर्नर-जनरल के एजेंट आस्ले ने अपने परिसर में चाय उगाने का सफल प्रयोग करने के बाद फोर्ट विलियम स्थित बंगाल सरकार को सुझाव दिया था कि छोटानागपुर में चाय उगाई जा सकती है। इस सुझाव को स्वीकार कर लिया गया और रांची के आसपास के इलाकों में कई चाय और काफी के बागान शुरू किए गए। रांची में चाय की खेती 1862 से चली आ रही है और इसकी शुरुआत स्टेनफोर्थ ने की थी, जो एक सेवानिवृत्त नागरिक थे और रांची में बस गए थे। उन्होंने दो बागान शुरू किए, एक रांची से लगभग तीन मील उत्तर में होटवार में और दूसरा लगभग 12 मील पूर्व में प्लांडू में। इस बागान को उन्होंने बड़कागढ़ एस्टेट से पट्टे पर लिया था, जिसे विद्रोह के बाद सरकार ने जब्त कर लिया था। 1872 में प्लांडू बागान का पूरा क्षेत्र (184 एकड़) परिपक्व पौधों से आच्छादित था और इससे 20,500 पाउंड (एक पाउंड-450 ग्राम) पत्तियां प्राप्त हुईं, जिनका उपयोग काली चाय बनाने में हुआ।
होटवार एस्टेट में केवल 35 एकड़ क्षेत्र परिपक्व पौधों से आच्छादित था और इससे 3,200 पाउंड चाय प्राप्त हुई। इसके बाद कई नए बागान खोले गए और सभी यूरोपीय प्रबंधन के अधी थे। 1966 तक 2,070 एकड़ क्षेत्र में फैले 21 बागान थे, जबकि उत्पादन 300,000 पाउंड से अधिक हो रहा था। उसी समय पूरी तरह से काफी की पत्तियों से ग्रीन टी बनाई जाती थी। छोटा नागपुर में काफी की पैदावार भी अच्छी होती थी, लेकिन बड़े पैमाने पर इसकी खेती नहीं की जाती है। रांची का पुरुलिया रोड काफी की खेती के लिए प्रसिद्ध था और इसकी खेती जाहिर है, मिशनरियां कराती थीं। उसी तरह चाय बागान की खेती पिस्का मोड़ और नामकुम क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर की जाती थी। इन बागानों में हरी चाय का उत्पादन होता था, जिसे कलकत्ता भेजा जाता है और वहां से इसे मुख्य रूप से मध्य पूर्व के देशों में निर्यात किया जाता है। जिन 12 चाय बागानों का उल्लेख मिलता है, उनमें से 11 सुवर्णरेखा कृषि संपदा, प्लांडू के अंतर्गत आते थे, प्लांडू और सबेया नामक दो समूहों में विभाजित किया गया था। शेष एक, यानी दलादली चाय बागान, डोला चाय संपदा के अंतर्गत आता था।

