

रांची : राजधानी का पहाड़ी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक स्थल भी है। आजादी के बाद सबसे पहले तिरंगा यहीं फहराया गया था और यहां तिरंगा फहरानेवाले स्वतंत्रता सेनानी का नाम था केसी दास। उन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना जीवन कुर्बान करनेवाले दीवानों के नाम पर यहां आजादी की मध्य रात्रि को तिरंगा लहराया था। केसी दास का पूरा नाम कृष्ण चंद्र दास था। तब से आज तक हर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर यहां तिरंगा लहराया जाता है। पहाड़ी मंदिर में एक शिलापट्ट भी है जिसमें इसका उल्लेख है कि आजादी की मध्य रात्रि में यहां तिरंगा लहराया गया था।




अंग्रेजों के जमाने में था फांसी टुंगरी
पहाड़ी मंदिर का पुराना नाम तिरीबुरु था पर अंग्रेजी राज में पहाड़ी मंदिर का नाम बदल गया। बाद में यह फांसी टुंगरी के नाम से जाना जाने लगा। यहां अंग्रेज उन क्रातिकारियों को फांसी देते थे जो अंग्रेजी राज के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकते थे। इसी वजह से इसे फांसी टुंगरी कहा जाता था। इतिहासकार बताते हैं कि पहाड़ी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम से भी इसका गहरा जुड़ाव रहा है। मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यह रांची के हृदय स्थल में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। स्वतंत्रता के बाद जब देश में आज़ादी का उत्सव पहली बार मनाया गया, तब रांची में तिरंगा फहराने का सम्मान इसी मंदिर को मिला, आधी रात को इस जगह पर तिरंगा फहराया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि उस समय तिरंगा किसी मंदिर के गुंबद पर फहराया गया था, जो अपने आप में अद्वितीय घटना थी।हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर यहां का माहौल विशेष रूप से उत्सवमय हो जाता है। सुबह-सुबह भजन, मंत्रोच्चारण और राष्ट्रीय गीतों की गूंज वातावरण को देशभक्ति से भर देती है। स्थानीय नागरिक और दूर-दराज़ से आए श्रद्धालु तिरंगे के साथ फोटो खिंचवाते हैं और ‘भारत माता की जय’ के नारों से पूरा परिसर गूंज उठता है।

