अनूप नारायण सिंह
रांची की पहचान सिर्फ पहाड़ियों, झरनों और हरियाली से नहीं है। इस शहर की मिट्टी में इतिहास की ऐसी कई परतें दबी हैं, जिनके सामने खड़े होकर बीते हुए समय की आवाज सुनाई देती है। इन्हीं ऐतिहासिक इमारतों में एक नाम है—ऑड्रे हाउस।राजभवन परिसर के निकट स्थित यह भवन आज भले ही कला और संस्कृति से जुड़ी गतिविधियों का केंद्र दिखाई देता हो, लेकिन इसकी दीवारों ने ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक दौर से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाओं तक को देखा है।1854 में रखी गई थी नींव।ऑड्रे हाउस का निर्माण 1854 में कैप्टन हैनिंग्टन ने कराया था। उस समय वे 1850 से 1856 तक छोटानागपुर के डिप्टी कमिश्नर रहे। पुराने दस्तावेजों में भी इसका उल्लेख शुरुआती सरकारी इमारतों में मिलता है।

कभी था डिप्टी कमिश्नर का आवास
यह भवन ब्रिटिश दौर में डिप्टी कमिश्नर का आवास भी रहा और बाद में प्रशासनिक गतिविधियों का अहम हिस्सा बन गया। रांची जब ग्रीष्मकालीन राजधानी बना, तब इसकी भूमिका और बढ़ गई।गांधी और चंपारण से जुड़ा ऐतिहासिक पल4 जून 1917 को महात्मा गांधी और लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गेट की मुलाकात रांची में हुई। इसी बातचीत ने चंपारण के किसानों की समस्या के समाधान की दिशा तय की और आगे चलकर 1918 के कानून का रास्ता खुला। यह घटना ऑड्रे हाउस को राष्ट्रीय इतिहास से जोड़ती है।
समय के साथ बदलती भूमिका
वर्ष 1931 के बाद जब प्रशासनिक केंद्र राजभवन की ओर शिफ्ट हुआ, तो ऑड्रे हाउस की भूमिका बदल गई। यह धीरे-धीरे एनेक्सी और बाद में उपेक्षित भवन बन गया, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व बना रहा।
संरक्षण और नया जीवन लकड़ी, मिट्टी और खपरैल से बने इस भवन का संरक्षण चुनौतीपूर्ण था। 6.27 करोड़ रुपये की लागत से इसका पुनरुद्धार हुआ और 2016 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसका उद्घाटन किया। इसके बाद इसे कला और संस्कृति केंद्र के रूप में विकसित किया गया। आज यहां कला प्रदर्शनियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्थानीय कलाकारों की गतिविधियां होती हैं। कभी प्रशासनिक शक्ति का केंद्र रहा यह भवन अब झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मंच दे रहा है।एक इमारत, कई कहानियां।करीब 172 वर्षों के सफर में ऑड्रे हाउस ने कई दौर देखे—ब्रिटिश शासन, गांधी का आगमन, प्रशासनिक बदलाव और अब सांस्कृतिक पुनर्जागरण। इसकी दीवारें आज भी उस इतिहास को संजोए हुए हैं, जो रांची की आत्मा का हिस्सा है।


