महेश झालानी
गरीबों के आशियानों पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार रसूखदारों के फार्महाउसों के सामने नतमस्तक क्यों? हाईकोर्ट के आदेशों की भी परवाह नहीं! आखिर रामगढ़ के भूमाफियाओं को किसका संरक्षण हासिल है? शिखर अग्रवाल प्रकरण में सरकार का रुख देखकर लगता है कि राजस्थान में कानून का डंडा पूरी ताकत से चल रहा है। कार्रवाई की चर्चाएं हैं, शिकंजा कसने की तैयारी है और नौकरशाही में हड़कंप मचा हुआ है। सरकार को कार्रवाई करनी है तो बेशक करे, लेकिन फिर एक सवाल का जवाब भी दे। रामगढ़ बांध के जलग्रहण क्षेत्र को कब्जाने वाले रसूखदार भूमाफियाओं पर यही सख्ती क्यों नहीं दिखाई देती? क्या कानून की धार व्यक्ति की हैसियत देखकर बदल जाती है?

रामगढ़ बांध कोई सामान्य अतिक्रमण का मामला नहीं है। पिछले 15 वर्षों से राजस्थान हाईकोर्ट इस मामले की निगरानी कर रहा है। अदालत के आदेश हैं, अतिक्रमणकारियों की सूचियां हैं, 273 चिह्नित निर्माणों का मामला है और नदी-नालों के प्राकृतिक रास्ते रोकने के गंभीर तथ्य हैं। फिर भी कार्रवाई का परिणाम कहां है? बांध में पानी पहुंचाने वाले रास्ते ही कब्जों की गिरफ्त में हैं और प्रशासन मानो गहरी नींद में सो रहा है। इसी 30 जुलाई को हाईकोर्ट ने पांच तहसीलों में अतिक्रमण, फार्महाउस, होटल और निर्माणों का पूरा ब्यौरा मांगा। 13 अगस्त को अदालत ने अतिक्रमणकारियों के नाम प्रकाशित कराने, 15 दिन का अवसर देने और कब्जे नहीं हटाने पर बेदखली, पुलिस सहायता तथा आपराधिक मुकदमों तक के निर्देश दिए।

रास्ता भी अदालत ने बता दिया और कार्रवाई की जिम्मेदारी भी प्रशासन को सौंप दी। फिर भी सवाल कायम है कि कितने कब्जे हटे और कितने रसूखदारों पर कार्रवाई हुई? इसी 7 अक्टूबर को Keemaya Resorts मामले में हाईकोर्ट के सामने एक और चौंकाने वाला तथ्य आया। कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट और सैटेलाइट तस्वीरों में संबंधित संपत्ति गोमती नाले और रामगढ़ जलाशय क्षेत्र में बताई गई। इसके बावजूद विभिन्न विभागों की एनओसी कैसे जारी हो गई? क्या अधिकारियों ने आंखें बंद करके मंजूरियां बांटीं? यदि निर्माणकर्ता जिम्मेदार हैं तो एनओसी देने वाले अधिकारी दूध के धुले कैसे हो सकते हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि हाईकोर्ट के आदेशों की पालना आखिर कौन सुनिश्चित करेगा? यदि अधिकारी ही आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दें तो न्यायपालिका की निगरानी का अर्थ क्या रह जाएगा? जानबूझकर आदेशों की अवहेलना करने और कार्रवाई में बाधा डालने वालों के खिलाफ अवमानना सहित कठोर कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? न्यायपालिका के सम्मान का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार को इसका जवाब देना चाहिए । गरीब की झोपड़ी हटाने के लिए बुलडोजर तत्काल पहुंच जाता है, लेकिन रसूखदारों के फार्महाउस और रिसॉर्ट के सामने प्रशासन के हाथ-पांव क्यों फूल जाते हैं? क्या इन निर्माणों के पीछे कोई ऐसा राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण है, जिसके कारण अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं? सरकार को इन सवालों से मुंह चुराने के बजाय जवाब देना चाहिए।
शिखर अग्रवाल पर कार्रवाई का शोर मचाने वाली सरकार को रामगढ़ के बड़े मगरमच्छों पर भी हाथ डालने का साहस दिखाना होगा। वरना जीरो टॉलरेंस का दावा महज राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा। रामगढ़ बांध को भूमाफियाओं के हवाले छोड़कर जल संरक्षण की घोषणाएं करना सबसे बड़ा मजाक है। हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद कब्जे कायम रहें तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि कानून के राज पर गंभीर सवाल है। आखिर सरकार बताए, शिखर अग्रवाल के मामले में शिकंजा और रामगढ़ के भूमाफियाओं के मामले में खामोशी क्यों? क्या राजस्थान में कानून गरीबों के लिए कठोर और रसूखदारों के लिए लाचार है?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


