जयंती पर विशेष : ऋत्विक घटक को भारतीय सिनेमा का पितामह क्यों मानते थे सत्यजीत रे?

ऋत्विक घटक भारतीय सिनेमा के ऐसे महान फिल्मकार थे, जिन्होंने अपनी फिल्मों और कहानियों में विभाजन की त्रासदी, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और राजनीतिक चेतना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

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विश्व प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे ने कभी कहा था — ‘ ऋत्विक घटक सिनेमा इतिहास की सर्वाधिक मौलिक प्रतिभाओं में से एक हैं । ‘ सत्यजीत रे उन्हें भारतीय सिनेमा का पितामह ही नहीं मानते थे, एक निर्देशक के रूप में उनकी यथार्थवादी, कलात्मक, सौंदर्य दृष्टि और दृश्य फिल्मांकन की उनकी असाधारण क्षमता के कायल भी थे । ऋत्विक घटक का मानना था कि ” अच्छे सिनेमा को जिंदगी से अलग नहीं किया जा सकता । इसे लोगों की आकांक्षाओं और घबराहटों का प्रतिनिधित्व करना ही होता है । इसे समय के साथ कदम बढ़ाने होते हैं । इसकी जड़ें लोगों में होनी होती हैं । मेरे हिसाब से बंबई के सिनेमा की कोई जड़ें नहीं हैं ।… टैगोर ने एक बार कहा था, आर्ट को ब्यूटीफुल होना चाहिए, लेकिन उससे भी पहले उसे ट्रूथफुल यानी सच्चा होना चाहिए । ये सच क्या है ? कोई शाश्वत सच नहीं है । हर आर्टिस्ट को एक दर्दभरी निजी प्रक्रिया से गुजरने के बाद अपना ख़ुद का सच समझना होता है । और यही है जो उसे अभिव्यक्त करना है । .. “

वह कहते हैं — ” इस दुनिया में अभी तक वर्ग- हीन कला जैसी कोई चीज नहीं है । कारण ये है कि कोई वर्ग – हीन समाज ही नहीं है । हर कला यानी कलाकृति सापेक्षिक है और वह अंतत: इंसान से जुड़ी । हर कला को इंसान की बेहतरी के लिए काम करना ही चाहिए । मैं इन तथाकथित ‘ महान’ फिल्ममेकर्स को लेकर हैरान हूं, जो मूल रूप से कुछ नहीं बस नौसिखिए हैं और मानवीय रिश्तों के आर्ट का शोर मचाते रहते हैं । अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से बचने का ये बहुत चतुर तरीका है । असल में जो भी काम ये करते हैं वो सिर्फ उनकी अपनी सत्ता को फायदा पहुंचाने के लिए होता है । ये लोग इतने पक्षपाती हैं जितना कि कोई हो सकता है लेकिन अपक्षपाती होने का मास्क पहनते हैं । मैं ऐसे आदर्शों से घृणा करता हूं..। “

ऋत्विक घटक धुर मार्क्सवादी थे । लेकिन पार्टी के कार्ड होल्डर नहीं । उन्होंने जाने किस खीज में कभी कहा होगा — ” मनुष्य का सांस्कृतिक मन नष्ट हो गया है । ” ऐसी ही खीज एक बार डीपीटी ने भी व्यक्त कि थी — ” पूरा दौर ही नानपॉलिटिकल होता जा रहा है । दृष्टि छीज रही है । ” ऋत्विक दा का मानना था कि राजनीति जीवन का विराट अंश है । कुछ भी राजनीति निरपेक्ष नहीं हो सकता । आप या तो पक्ष में होते हैं या विपक्ष । ” मेरा उत्तेजक रक्त तुरंत प्रतिक्रिया चाहता है ” इसीलिए ऋत्विक घटक लेखन से फिल्म निर्माण की ओर उन्मुख हुए ।

ऋत्विक घटक विश्व सिनेमा संसार में अपनी उस्थिति दर्ज कराने वाले प्रथम तीन भारतीय फिल्मकारों में एक हैं— ( अन्य दो हैं सत्यजीत रे और मृणाल सेन ) । उनकी कहानियों का मूल बांग्ला से अनुवाद चंद्रकिरण राठी ने किया । ‘ यह एक अद्भुत संयोग है कि ऋत्विक घटक , सआदत हसन मंटो के समकालीन थे । विभाजन की विभीषिका और टूटते सामाजिक ताने बाने को उन्होंने भी गहराई से अनुभव किया था । मंटो की ही तरह उनकी कहानियां भी सामाजिक विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करती हैं—आवेग और आवेश उनकी कहानियों की थाती है । 1948 में ऋत्विक ने अपना पहला नाटक ‘ द डार्क लेक ‘ लिखा था और साल 1951 में वह इंडियन् पीपल्स थिएटर एसोसिएशन से जुड़ गए । इस दौरान ऋत्विक घटक ने लेखन के साथ निर्देशन की भी कमान संभाली और अभिनय भी किया।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।