भाजपा की असली चिंता गैर-राजनीतिक युवाओं के निकली ‘काक्रोच जनता पार्टी’ है

NEET पेपर लीक के मुद्दे पर गैर-राजनीतिक युवाओं के आंदोलन ने सरकार पर दबाव बढ़ाया है। 5 सितंबर के मार्च से पहले लंबित मांगों को पूरा करने की चुनौती है।

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शिवानंद तिवारी

राहुल गांधी का जहां-जहां उत्साह के साथ स्वागत हो रहा है, उससे भाजपा को उतनी चिंता नहीं है। उसकी असली चिंता तो गैर-राजनीतिक युवाओं के दिमाग से निकली ‘काक्रोच जनता पार्टी’ को लेकर है। क्योंकि इन युवाओं के कार्यक्रमों में एक ताजगी है। राजनीतिक पार्टियों के कार्यक्रमों का जो पिटा-पिटाया तरीका होता है, उससे ये बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। अब देखिए, 5 सितंबर को इन्होंने इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक जुलूस निकालने की घोषणा की है। 5 सितंबर शिक्षक दिवस है। इनकी योजना है कि NEET पेपर लीक के कारण जिन 21 छात्रों ने आत्महत्या की, उनके माता-पिता और परिजन जुलूस में सबसे आगे रहें। अब सवाल है-पुलिस क्या करेगी? क्या पुलिस उन माता-पिता पर लाठी चलाएगी? अगर चलाएगी तो देश में क्या संदेश जाएगा? यह भावना प्रधान देश है। मुझे नहीं लगता कि भाजपा के सामान्य समर्थक भी ऐसी कार्रवाई का समर्थन करेंगे।

और उनके पीछे कौन लोग होंगे? वे लड़के-लड़कियाँ होंगे, जिन्होंने जंतर-मंतर के आंदोलन में पुलिस की मार खाई है। जिनमें से कई घायल हुए थे। यानी सरकार के सामने सिर्फ नारे लगाने वाले लोग नहीं होंगे, बल्कि अपने साथ हुई ज्यादती की याद लेकर खड़े युवा होंगे। इन युवाओं ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट लगातार कह रहा था कि इस पूरे आंदोलन के दौरान जितने मुकदमे दर्ज हुए हैं, उनकी पूरी सूची अदालत को दी जाए। सरकार वह सूची देने में हिल-हुज्जत कर रही थी। जबकि सरकार और युवाओं के बीच जो समझौता हुआ था, उसमें मुकदमे वापस लेना भी शामिल था। लेकिन 5 सितंबर को इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक जुलूस की घोषणा होते ही सरकार ने मुकदमों की पूरी सूची सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी। इससे एक बात तो साफ है-दबाव काम कर रहा है।

अब समझौते की एक बड़ी माँग बाकी रह गई है। NEET पेपर लीक के कारण जिन 21 युवाओं ने आत्महत्या की, उनके परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये की सहायता देने की बात सरकार के दोनों प्रतिनिधि मंत्रियों के सामने स्वीकार की गई थी। तो फिर सरकार उसे पूरा करने में देर क्यों कर रही है? मुझे उम्मीद है कि 5 सितंबर से पहले सरकार यह माँग पूरी कर देगी। क्योंकि सरकार के लिए भी बेहतर यही होगा कि वह युवाओं के साथ टकराव का रास्ता छोड़कर जो बात मान चुकी है, उसे लागू करे। वरना 5 सितंबर को सवाल सिर्फ एक जुलूस का नहीं होगा। सवाल यह भी होगा कि क्या सरकार अपने ही किए हुए समझौते का सम्मान करती है या नहीं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।