रांची: रिम्स के मनोचिकित्सा विभाग में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान मेडिकल इंटर्न, मरीजों और उनके परिजनों को संबोधित करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि आत्महत्या को सही समय पर पहचान और खुली बातचीत के माध्यम से रोका जा सकता है।

वर्ष 2024 से 2026 तक के लिए तय विषय ‘आत्महत्या पर कथानक बदलना’ और ‘बातचीत की शुरुआत करें’ के तहत लोगों को इस समस्या से जुड़े सामाजिक कलंक को मिटाने की अपील की गई।

कार्यक्रम में मनोचिकित्सा विभाग के प्रो. (डॉ.) मेजर अजय कुमार बाखला और डॉ. विद्या के. एल. ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मिथकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के बारे में सीधे और सहानुभूतिपूर्वक पूछने से जोखिम कम होता है, न कि बढ़ता है।
इसके अलावा, अधिकांश मामलों में व्यक्ति कोई न कोई चेतावनी संकेत जरूर देता है और अत्यधिक तनाव की स्थिति में बिना किसी मानसिक बीमारी के भी इंसान ऐसा कदम उठा सकता है।
प्रो. बाखला ने कहा कि जीवन बचाने के लिए किसी विशेषज्ञ का होना ही अनिवार्य नहीं है, बल्कि कोई भी आम इंसान एक ‘गेटकीपर’ की भूमिका निभा सकता है।
आरक्यूपीआर (RQPR) मॉडल के तहत संकट के संकेतों को पहचानकर, बिना झिझक पूछकर, मदद के लिए प्रेरित करके और सही संसाधनों तक पहुंचाकर किसी की जान बचाई जा सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर साल सात लाख बीस हजार से अधिक लोग आत्महत्या से अपनी जान गंवाते हैं। वहीं 15 से 29 वर्ष के युवाओं में यह मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण है। भारत में भी इसकी दर प्रति एक लाख पर 12.3 है। ऐसे में रिम्स रांची में निःशुल्क मनोरोग परामर्श उपलब्ध कराया जा रहा है।
साथ ही मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए 24 घंटे काम करने वाली टेली-मानस (Tele MANAS) हेल्पलाइन नंबर 14416 पर संपर्क किया जा सकता है।


