- विनीत कुमार
एक मीडिया छात्र-अध्येता से जब सवाल पूछा जाएगा कि दि इंडियन एक्सप्रेस की रीतिका चोपड़ा ने चुनाव आयोग को लेकर जो रिपोर्टिंग की, उसे लेकर आप क्या सोचते हो ? उस सोचने से आशय ये है कि इसका आपके उपर क्या असर हुआ ?

इस बात का जवाब मीडिया के छात्र अपने-अपने ढंग से दे सकते हैं और ज़ाहिर है कि उन जवाबों में लोकतंत्र से जुड़ी बातें भी शामिल होगी, होनी भी चाहिए.
लेकिन, मैं इस बात को इस हिसाब से भी देखता हूं कि थोड़े दिनों के लिए ही सही, रीतिका चोपड़ा ने अपनी ही बिरादरी के लोगों के भीतर नए सिरे से आत्मविश्वास बनाए रखने का काम किया. लिखने-पढ़ने, सोचने-समझने और थोड़ा समय लगाकर काम किए जानेवाले पत्रकारिता के पेशे को जिस तेज़ी से रील्स काटने और एडिटिंग मशीन की संतानों के बूते वायरल कराने की कोशिश में लगे मीडियाकर्मियों के भीतर जो ये भरोसे की अति पैदा होता आया है कि जो वायरल नहीं हो सकेगा वो ख़बर नहीं है, इस पर थोड़ा फिर से सोचने का एक तरह से आग्रह है. वो एक जगह कहती भी हैं कि ऐसा नहीं होता कि कोई आपको पर्ची पकड़ा देता है और आप ख़बर ब्रेक कर देते हो, ये फ़िल्मी जैसी चीज़ नहीं है, ये समय लगाकर किया जानेवाला काम है. लंबे समय बाद किसी पत्रकार का काम एक से ज़्यादा दिनों तक चर्चा में बना रहा है और जब ऐसा होता है तो मीडिया के छात्रों के लिए शुरु से आख़िर तक एक अध्ययन का विषय होता चला जाता है.
आज से नहीं, शुरु से ही..जब किसी पत्रकार-मीडियाकर्मी का काम चर्चा में आता है तो वो अपने काम के साथ-साथ कुछ-न-कुछ ऐसा ज़रूर बोलते-बताते हैं जिनसे पत्रकारिता परिभाषित होती है. आप पी. साईनाथ से लेकर अभी रीतिका चोपड़ा तक के काम और इस दौरान कही गयी बातों पर ग़ौर करें तो आपको पत्रकारिता परिभाषित होती हुई मिलेगी. आमतौर पर ये परिभाषाएं मीडिया-पत्रकारिता की संगोष्ठियों में दोहरायी जाती है और न्यूज़रूम में अमूमन आदर्श का पुलिंदा मानकर ठिकाने लगा दिया जाता है. वायरल कंटेंट को फिर से माई-बाप मानकर ख़बरों से खेलने का काम शुरु हो जाता है.
इंडियन एक्सप्रेस हिन्दी के नए-नवेले शो “साम-दाम-दण्ड-भेद” में अबकी बार रीतिका चोपड़ा बुलायी जाती हैं. हालांकि इस नाम से साल 2017-18 में स्टार भारत पर धारावाहिक प्रसारित हो चुका है. वैसे तो इंडियन एक्सप्रेस हिन्दी में एक से एक रचनात्मक ढंग से लिखने-सोचनेवाले लोग काम कर रहे हैं लेकिन कार्यक्रम के नाम को लेकर वैसा ही अकाल हो गया जैसा किसी समाचार चैनल में हुआ करता है. ख़ैर,
प्रिंट के पत्रकारों की ख़ास तरह की ट्रेनिंग होती है. वो आप जब उन्हें सुनेंगे या फिर बात करेंगे तो समझ आ जाएगा. ये सर्वनामों का प्रयोग टीवी या डिज़िटल के लोगों से कम करते हैं. तो, लेकिन, कहीं-न-कहीं, ऐसा लगता है, यक़ीं मानिए, देखना होगा, कुछ तो है…जैसे चिप्पियों का प्रयोग कम करते हैं जो कि पहले के वाक्य का अर्थ खा जाने का काम करते हैं.
ऐसा करने से वीडियो लंबा होता है और पूरा देखिए का आग्रह तो ज़रूर साथ चलता है लेकिन एक दर्शक के तौर पर हमें उलझे हुए बाल ही लगते हैं जिसकी खाल निकालने में हम दर्शक पस्त हो जाते हैं. ख़ैर,
इंडियन एक्सप्रेस हिन्दी के संपादक और साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रस्तोता की भी प्रिंट की मजबूत ट्रेनिंग और पृष्ठभूमि रही है. आप उनकी भाषा और विश्लेषण करने के अंदाज़ से स्वाभाविक ढंग से समझ जाएंगे. निस्संदेह इन दिनों हमारी स्क्रीन पर मीडिया के चेहरे आ रहे हैं, उनमें से द्विवेदी की भाषा अलग और शानदार है.
लेकिन वो अब एक कोलाज़ पत्रकार हैं जिसका मतलब है कि उनके अंदाज़, भाषा और व्यक्तित्व में थोड़ा टीवी,थोड़ा बॉलीवुड, थोड़ा पेज थ्री सर्किट, थोड़ी कविताई, थोड़ा बाबाडम, थोड़ी शोहरत, थोड़ी रील्स काटो गुरु की पुरानी अदायगी…सब चिपकती चली गयी है. शायद इसलिए रीतिका चोपड़ा से बात करने और उसके बाद की “हिट्स बटोरू सामग्री” में इन सबकी छाया झलकने लग जाती है. वो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते नज़र आते हैं कि इस एपिसोड को दि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स मीटिंग जैसी गंभीरता दें लेकिन “ वायरल कंटेंट की तलाश बाबू भैया” के असर से कम से कम कार्यक्रम के बाहर की बातचीत में ख़ुद को रोक नहीं पाते. दूसरी तरफ, फ़्रेम में आपने रीतिका चोपड़ा की स्टोरी किए जाने को लेकर सौरभ द्विवेदी को जितनी भी बार देखा होगा, आपकी स्क्रीन से जैसे आवाज़ आ रही होगी- आज जो चुनाव आयोग को लेकर इतनी चर्चा हो रही है, स्टोरी भले ही रीतिका चोपड़ा ने की हो, चर्चा में लानेवाले हमहीं हैं. कहे गए शब्दों के अलावा भाव-भंगिमा पर ग़ौर करेंगे तो प्रिंट के न्यूज़रूम की “अनसंग हीरो” वाला अंदाज़ ग़ायब मिलेगा..और यहीं पर,
एक मीडिया छात्र होने के नाते आप रीतिका चोपड़ा के कहने और मौज़दूगी पर टिककर ग़ौर करने लग जाते हैं. उनके लिए स्टोरी ज़रूरी है, वो ख़ुद नहीं. स्टूडियो में उनकी स्टोरी पर बात हो रही है, उनके पूरे अंदाज़ में कहीं नहीं है कि उन पर बात होने लग जाए. बहुत संभव है कि कल को उनकी डाइट चार्ट से लेकर टू डू लिस्ट तक पर बात होने लगे, सौरभ द्विवेदी तो कार्यक्रम के बाहर की बातचीत से उसी दिशा में ले जाने की कोशिश करते नज़र आते हैं. ये चल निकला तो आनेवाले समय में चोपड़ा भी पत्रकारिता की दुनिया के “पंकज त्रिपाठी” हो जाएं कि “दि पंकज त्रिपाठी युग” के एक-एक पल को स्क्रीन पर लाकर निचोड़ लेना है. लेकिन अभी तक यही है कि हमारे लिए स्टोरी मायने रखती है. दि इंडियन एक्सप्रेस हिन्दी और द्विवेदी की टाइमलाइन पर जो खुदरा क्लिप्स-रील्स हैं, उनसे आप और बेहतर समझ सकते हैं.
स्टोरी की तरफ लौटना, अपनी उपस्थिति के आगे पेशे को कमतर नहीं मानना. मीडिया में जो पचास गड़बड़ियां आयी हैं, उनमें से एक बड़ी गड़बड़ी काम को धकेलकर चेहरे को चिपकाना भी रहा है. वो चेहरा हम दर्शकों-पाठकों पर इतना हावी हो जाता है कि उसका शानदार किया काम भी जुड़ाव कम, ऊब पैदा करने लग जाता है. पत्रकारिता में चेहरे ऊब पैदा करते हैं और काम संतुलन. रीतिका चोपड़ा सालों से पत्रकारिता कर रही हैं, दस साल से तो चुनाव आयोग ही कवर कर रही हैं लेकिन उनके भीतर वायरल होने की तड़प वैसी नहीं रही, जैसी मीडिया संस्थानों में सबकुछ किए कराए पर अचानक से चमकीले चेहरे के स्क्रीन पर कूद जाने की हुआ करती हैं.
संभव है कि डिज़िटल प्लेटफ़ार्म पर उनकी लगभग अनुपस्थिति और अख़बार के पन्नों पर मज़बूत उपस्थिति ने उनके काम को कहीं ज़्यादा असरदार बनाया. ये प्लेटफॉर्म्स एकदम से चमक तो पैदा करते हैं लेकिन चेहरे को साबुन की टिकिया में बदल देते हैं जो धीरे-धीरे गलता हुए दर्शकों के मन से या तो उतरता चला जाता है या फिर उसकी ऐसी चमक नहीं रह जाती जैसी आज रीतिका चोपड़ा की बनी है.
बात सिर्फ़ मीडिया की नहीं, हर पेशे की है. इनसे जुड़े लोग यदि ढंग का काम करते हैं तो चाहनेवाले उनकी तरफ लौटते हैं- अख़बार की तरफ पाठक, दर्शक-दीर्घा की तरफ दर्शक, वाहन की तरफ सवारी…


