रांची : अंग्रेजी हुकूमत ने राजमहल को तोप से उड़ा दिया, रियासत छीन ली, लेकिन मां भगवती के प्रति आस्था को नहीं मिटा सकी। स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के संघर्ष और स्वाभिमान की यह गाथा आज भी बड़कागढ़ राजपरिवार की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा में जीवंत है। विपरीत परिस्थितियों में शहीद की पत्नी ठकुरानी बाणेश्वरी कुंवर ने न केवल परिवार की विरासत संभाली, बल्कि मां भगवती चिंतामणि की आराधना को भी अक्षुण्ण रखा। उन्हीं के द्वारा वर्ष 1880 में स्थापित प्राचीन देवी घर में आज भी शारदीय और चैत्र नवरात्र पर पारंपरिक विधि से पूजा होती है।

बड़कागढ़ एस्टेट के उत्तराधिकारी एवं स्वर्गीय ठाकुर नवीन नाथ शाहदेव के पुत्र ठाकुर सुधांशु नाथ शाहदेव बताते हैं कि अंग्रेजों द्वारा चिरनागढ़, हटिया स्थित राजमहल ध्वस्त किए जाने के बाद ठकुरानी बाणेश्वरी कुंवर अपने एक वर्षीय पुत्र ठाकुर कपिल नाथ शाहदेव को लेकर खोरा के जंगलों में छिप गई थीं। वह अपने साथ आराध्य देवी की प्रतिमा और पांच नगाड़े भी ले गई थीं। वर्ष 1874 में उन्होंने अंग्रेजों के समक्ष रियासत लौटाने की मांग रखी, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि, अंग्रेजों ने उनके और पुत्र के रहने के लिए जगन्नाथपुर मंदिर के समीप खपरैल का मकान बनवाया। यहीं से ऐतिहासिक ठाकुर निवास में मां चिंतामणि की नियमित आराधना की परंपरा आगे बढ़ी।
बलि की परंपरा के लिए अलग स्थापित हुआ देवी घर
जगन्नाथपुर भगवान जगन्नाथ महाप्रभु का पुरुषोत्तम क्षेत्र माना जाता है, जहां धार्मिक मान्यता के अनुसार पशुबलि निषिद्ध है। वहीं बड़कागढ़ राजपरिवार में मां भगवती की तांत्रिक पूजा के साथ बलि की परंपरा रही है। इसी कारण ठकुरानी बाणेश्वरी कुंवर ने आनी मौजा में अलग देवी घर की स्थापना की। ठाकुर निवास में वर्षभर मां की पूजा होती है, जबकि नवरात्र के विशेष अनुष्ठान देवी घर में संपन्न होते हैं।
बहुओं की साड़ियों से सजी डोली, शंख-नगाड़ों के बीच निकली शोभायात्रा
महासप्तमी पर सुबह 10:30 बजे जगन्नाथपुर स्थित ऐतिहासिक ठाकुर निवास से मां भगवती चिंतामणि और देवी नवपत्रिका की शोभायात्रा निकली। बांस की डोली को राजपरिवार की बहुओं की साड़ियों से सजाया गया था। मंत्रोच्चार, शंख, घंटा, ढोल, नगाड़े और शहनाई की गूंज के बीच मां की डोली प्राचीन देवी घर पहुंची। पूरे मार्ग में जयकारे गूंजते रहे। शोभायात्रा के दौरान सामाजिक सौहार्द की मिसाल भी दिखी। स्थानीय ग्रामीणों, रांची नगर निगम के कर्मचारियों और मुस्लिम परिवारों ने मिलकर मार्ग की सफाई की तथा पानी से धुलाई की।
तांत्रिक विधि से पूजा, सात बार हुई मां की आरती
देवी घर पहुंचने पर सबसे पहले देवी नवपत्रिका की बाहरी पूजा हुई, जिसमें परंपरा के अनुसार बकरे की बलि दी गई। इसके बाद मां चिंतामणि और नवपत्रिका की संयुक्त तांत्रिक पूजा में भी बलि की रस्म निभाई गई। मां की सात बार आरती उतारी गई। बड़कागढ़ के पुरोहित पंडित सदन गोपाल शर्मा ने अनुष्ठान संपन्न कराया, जबकि ठाकुर सुधांशु नाथ शाहदेव यजमान रहे। पूजा में राजपरिवार के सदस्यों के साथ जगन्नाथपुर, आनी, भूसुर, लटमा और मौसीबाड़ी सहित आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल हुए। मंगल आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया।
महाअष्टमी पर होगा विशेष महाहवन
महाअष्टमी पर देवी घर में तांत्रिक पद्धति से विशेष महाहवन किया जाएगा। इसमें चावल, जौ, तिल, गुड़, घी और मधु से तैयार हवन सामग्री की आहुति दी जाएगी। यह अनुष्ठान भी देवी घर की स्थापना के समय से चला आ रहा है। ठाकुर सुधांशु नाथ शाहदेव के अनुसार, मां भगवती चिंतामणि की आराधना राजपरिवार की गौरवशाली विरासत का अभिन्न हिस्सा है। पूजा के माध्यम से समस्त समाज के सुख, शांति और कल्याण की कामना की जाती है। बड़कागढ़ की यह दुर्गा पूजा धार्मिक आस्था के साथ झारखंड के स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक विरासत की भी पहचान है। राजमहल भले ही अंग्रेजी अत्याचार की भेंट चढ़ गया, लेकिन उससे जुड़ी आस्था और परंपराएं आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित हैं।


