रांची: राजधानी रांची के कांके प्रखंड स्थित बोड़ेया गांव में आदिवासी धर्म, संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के संरक्षण को लेकर ग्रामसभा ने बड़ा फैसला लिया है। सोमवार को ग्राम प्रधान अनिल उरांव की अध्यक्षता में हुई बैठक में धर्म प्रचारकों और पादरियों के प्रवेश पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद बोड़ेया चौक पर चेतावनी बोर्ड भी लगाया गया।
ग्रामसभा ने चंगाई प्रार्थना सभाओं पर जताई आपत्ति
ग्रामसभा के निर्णय के बाद गांव के चौक पर बोर्ड लगाया गया। बोर्ड लगाने से पहले विश्वकर्मा पहान ने विधि-विधान से पूजा-पाठ किया। पंचायत के मुखिया सोमा उरांव ने बताया कि बीमारी ठीक करने के नाम पर आयोजित की जाने वाली चंगाई प्रार्थना सभाओं और प्रार्थना महोत्सव जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने का फैसला किया गया है।
उन्होंने कहा कि इस निर्णय का उद्देश्य आदिवासी समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना है। ग्रामसभा ने चेतावनी दी है कि फैसले का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अपने स्तर पर कार्रवाई की जाएगी।
धर्मांतरण से पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित होने का दावा
झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति, धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव ने कहा कि धर्मांतरण के कारण आदिवासी समाज की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। उनके अनुसार, इसका असर समुदाय की पारंपरिक स्वशासन प्रणाली पर भी पड़ रहा है।
उन्होंने आदिवासी समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने की आवश्यकता बताई।
ग्रामसभा के अधिकारों का दिया हवाला
जनजाति सुरक्षा मंच के क्षेत्रीय संयोजक संदीप उरांव ने कहा कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में ग्रामसभा को जनजातीय धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं के संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने अपने पक्ष में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि संबंधित निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।
बैठक में कई लोग रहे मौजूद
ग्रामसभा से जुड़े इस कार्यक्रम में जिला परिषद सदस्य किरण देवी, वार्ड सदस्य कैलाश मंडा, सामाजिक कार्यकर्ता झरी उरांव, राजन उरांव, अरविंद साहू, फूलचंद तिर्की, आदित्य महतो, संतु कुमार महतो, जनजाति सुरक्षा मंच के प्रदेश सदस्य सनी उरांव, प्रदीप टोप्पो और प्रोफेसर गंवा तिग्गा सहित कई लोग उपस्थित रहे।
बोड़ेया में ग्रामसभा के इस फैसले के बाद आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि, ग्रामसभा के निर्णय के कानूनी दायरे और इसे लागू करने की वैधता का आकलन संबंधित कानूनों और न्यायिक फैसलों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।


