अंबरीश कुमार
सुबह चाय का कप लेकर बाहर आए तो धुन्ध और बादल जंगल को घेरे हुए थे। ज्यादा दूर तक नहीं देख सकते थे। चौकीदार ने आगाह किया था जब अंधेरा छट जाए तभी नीचे जंगल के रास्ते पर जाएं क्योंकि जंगली जानवर टकरा सकते है।
यह बांज का जंगल है। हम यहां जंगलात विभाग के सवा सौ साल पुराने डाक बंगले में है। यह बिनसर का जंगल हैं किसी जंगल की तरह। यहां जंगल की आवाज सुनाई पडती है जब हवा चलती है। जंगल बचे ही कितने है और जो बचे हैं उनमें जंगल जैसा माहौल भी नहीं है। जानवर के नामपर बन्दर या लंगूर और बीच में पिकनिक स्पाट बना नजर आता है। ऐसे में बिनसर का यह जंगल हमें जंगल जैसा अहसास देने वाला था। कई जगह तो सूरज को भी जमीन तक आने का मौका नहीं मिलता है। इतना घना जंगल। बांज का जंगल पानी लेता भी है और पानी देता भी है।


बिनसर का यह जंगल पानी का बड़ा स्रोत है। जगह जगह झरने फूटते दिखाई पड़ते हैं। कुछ किलोमीटर ऊपर चढ़े थे तभी बुग्याल जैसा एक हराभरा मैदान आ गया। दायें दो मंदिर थे जिन्हें बिनसर महादेव का मंदिर बताया गया था। पीछे बड़े दरख्त थे। सड़क के दूसरी तरफ से एक झरना बहता हुआ मंदिर के हरे-भरे मैदान की तरफ किसी बरसाती नदी की तरह जा रहा था। नीचे से आये थे जो गर्म इलाका था। पर यहां ठंढ थी। हलकी बरसात से ठंढ और बढ़ गई थी। जंगल भीगा हुआ था मानो सुबह की ओस बांज के पत्तो पर ठहरी हुई हो। कहीं धुंध भी थी। बरसने के बावजूद बादलों की इच्छा भरी नहीं थी यह साफ़ लग रहा था। हम ऊपर चढ़ रहे थे पीरुल सड़क पर बिखरा तगा।
यह चीड़ का सूखा पत्ता होता है जो फलों की पैकिंग में काम आता है। पर पहाड़ी ढलान पर यह बहुत खतरनाक होता है। एक झटके में आपको ऊपर से नीचे खाई में पहुंचा देगा किसी फिसल पट्टी की तरह। इसलिए गाडी चलाने वाले को भी सावधान रहना चाहिए। बड़ी गाड़ी के लिहाज से सड़क बहुत संकरी है। बीच में चौड़ी जगह भी नहीं है। अगर ऊपर से कोई गाडी आ गई तो पीछे एक दो किलोमीटर तक जाना पड़ सकता है। यह सब समझ कर ही ऊपर चढ़ें। रस्ते में जंगल में उतर कर सेल्फी लेना भी ठीक नहीं। हिरन तो कुछ न करें लेकिन तेंदुआ या भालू बिना वजह भी हमला कर सकता है। इसलिए नीछे उतरने से पहले दोनों तरफ देख जरुर लें खासकर सुबह और शाम के समय। यह जानवरों के बाहर निकलने का समय होता है। और यह डाक बंगला है 124 साल पुराना। बिजली नहीं है। नेटवर्क भी नहीं। जब जंगल आयें तो शहर छोड़ कर ही आयें। हवा तेज है और बरसात हो चुकी है। शॉल निकाली जा चुकी है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


