अंटार्कटिका क्रूज हादसे ने बढ़ाई खतरनाक वायरसों की चिंता

Manu Shrivastava
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अंटार्कटिका की यात्रा पर निकले एक लग्जरी क्रूज शिप पर तीन यात्रियों की मौत के बाद दुनिया भर में खतरनाक और अज्ञात वायरसों को लेकर चिंता फिर बढ़ गई है। जांच में पाया गया कि इस घटना के पीछे “हंता वायरस” का एंडीज स्ट्रेन जिम्मेदार था। यह वायरस सामान्यतः चूहों और खरगोशों से इंसानों में फैलता है, लेकिन एंडीज स्ट्रेन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह इंसानों से इंसानों में भी तेजी से फैल सकता है।

 

कोरोना जैसे लक्षण, लेकिन इलाज नहीं

 

विशेषज्ञों के अनुसार, हंता वायरस संक्रमण के लक्षण काफी हद तक कोरोना वायरस जैसे होते हैं। संक्रमित व्यक्ति को तेज बुखार, सांस लेने में दिक्कत और गंभीर फेफड़ों की समस्या हो सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि फिलहाल इसका कोई सटीक इलाज या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि यह वायरस वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

 

जैविक हथियार बनने का खतरा

 

इस घटना के बाद सुरक्षा विशेषज्ञों ने जैविक खतरों को लेकर नई चेतावनी दी है। उनका मानना है कि भविष्य में आतंकी संगठन वायरसों को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। “क्रिस्पर” जैसी जीन एडिटिंग तकनीक, जिसे आनुवांशिक बीमारियों के इलाज के लिए विकसित किया गया था, अगर गलत हाथों में पड़ जाए तो खतरनाक साबित हो सकती है। एआई और आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी की मदद से किसी साधारण वायरस को भी अधिक घातक बनाया जा सकता है।

 

सरकारी और निजी लैब्स पर चिंता

 

विशेषज्ञों का कहना है कि असली चुनौती बड़ी सरकारी और निजी प्रयोगशालाओं की निगरानी है। इतिहास में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान की यूनिट 731 और शीतयुद्ध के समय अमेरिका व सोवियत संघ द्वारा जैविक प्रयोग किए जा चुके हैं। आज भी कई निजी कंपनियां जैविक अनुसंधान में सक्रिय हैं, लेकिन उनकी निगरानी को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

 

इंटरनेट और एआई से बढ़ा खतरा

 

इंटरनेट पर पुराने वायरसों के जीनोम और रिसर्च डेटा आसानी से उपलब्ध हैं। इससे तकनीक के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया है। इसी कारण ओपनएआई, गूगल और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियां अपने एआई मॉडल्स में बायोटेररिज्म से जुड़े सुरक्षा उपाय जोड़ रही हैं।

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