


रांची: देशभर में इन दिनों प्लैटिनम ग्रुप की कीमोथेरेपी दवाओं की भारी किल्लत देखी जा रही है, जिसका सीधा और गंभीर असर कैंसर मरीजों के इलाज पर पड़ने लगा है। ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, कीमोथेरेपी में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली दो प्रमुख दवाओं कार्बोप्लेटिन और सिसप्लेटिन की आपूर्ति देशभर के साथ-साथ रांची में भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। स्थिति यह बन गई है कि ये दवाएं आसानी से बाजार में उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।





रिम्स में कीमोथेरेपी कराने वाले मरीजों के परिजनों ने बताया कि जो दवा दो महीने पहले तक तीन हजार रुपये में मिल जाती थी, अब उसी के लिए परिजनों को पांच हजार रुपये तक का भुगतान करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पहले प्लैटिनम ग्रुप की इन दवाओं की एक वायलबद्ध (vial) कीमत लगभग 2500 से 3000 रुपये के बीच थी, लेकिन वर्तमान में इसकी कीमत बढ़कर करीब 5000 रुपये तक पहुंच गई है। सरकारी अस्पतालों में इन दवाओं की उपलब्धता न होने के कारण मरीजों को बाहर निजी दुकानों से महंगी दरों पर दवा खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनके इलाज का बजट काफी बढ़ गया है।
दवाओं की कमी और महंगाई के कारण कई मरीज आर्थिक तंगी के चलते अपनी अगली कीमोथेरेपी साइकिल को टालने पर मजबूर हो रहे हैं। वहीं, कुछ मरीज और उनके परिजन कर्ज लेकर या अतिरिक्त खर्च वहन करके जैसे-तैसे दवाएं खरीदकर इलाज जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं।
क्यों जरूरी हैं ये दोनों दवाएं?
ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, कार्बोप्लेटिन और सिसप्लेटिन प्लैटिनम आधारित ऐसी कीमोथेरेपी दवाएं हैं, जो कैंसर कोशिकाओं के डीएनए (DNA) को नुकसान पहुंचाकर उनकी वृद्धि को रोकती हैं। कार्बोप्लेटिन का उपयोग मुख्य रूप से ओवेरियन (अंडाशय), फेफड़े, स्तन, सर्वाइकल, सिर एवं गर्दन के कैंसर, कुछ ब्रेन ट्यूमर और टेस्टिकुलर कैंसर के इलाज में किया जाता है।
वहीं सिसप्लेटिन दवा का उपयोग सिर व गर्दन, फेफड़े, मूत्राशय, सर्वाइकल, अन्ननली, पेट, ओवेरियन और टेस्टिकुलर कैंसर के इलाज में ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ माना जाता है।
