बेंगलुरु: कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने बृहस्पतिवार को मतदाता सूचियों के नए सिरे से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की मांग की और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग के अंदर कथित मतभेदों की खबरों के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। मीडिया में आई एक खबर के संदर्भ में पत्रकारों से बात करते हुए शिवकुमार ने कहा कि ये कथित मतभेद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। एक अंग्रेजी दैनिक की खबर में कहा गया था कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार फैसले लेने की प्रक्रिया पर औपचारिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराई हैं ।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में तीन में से दो सदस्यों ने अपनी असहमति जताई है। मतदान का अधिकार आज प्रभावित हुआ है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति और उसकी आजीविका की रक्षा करना है ।’’ शिवकुमार ने कहा कि कथित ‘‘वोट चोरी’’ का मुद्दा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बेंगलुरु से उठाया और उन्होंने कहा है कि मतदान का अधिकार हर नागरिक का है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभिन्न कारणों से कर्नाटक की मतदाता सूचियों से एक करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हमारी मतदाता सूची को अंतिम रूप दिया जाए। इसके बाद इस मुद्दे पर जिस भी तरीके से हमें अपनी आवाज उठानी होगी और लड़ाई लड़नी होगी, मैं निश्चित रूप से ऐसा करता रहूंगा।’’
मुख्यमंत्री ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को संचालित किए जाने के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने मांग की कि इस प्रक्रिया को रद्द कर नए सिरे से कराया जाए। उन्होंने कहा, ‘‘हम चाहते हैं कि नया एसआईआर कराया जाए। हम चाहते हैं कि सभी लोगों को उनके अधिकार मिलें।’’ उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संसद समेत सभी जगहों पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग के भीतर कथित असहमति का जिक्र करते हुए शिवकुमार ने कहा, ‘‘जब (असहमति जताने वाली) आवाजों को स्वीकार नहीं किया जाता और बहुमत के फैसले को कायम नहीं रखा गया है, तो वह (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) फैसले नहीं ले सकते।’’
शिवकुमार ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से ‘‘तुरंत पद छोड़ने’’ का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा किसी खास राजनीतिक दल के वोटों से जुड़ा नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक के मताधिकार से संबंधित है। उन्होंने कहा, ‘‘हम कांग्रेस के वोट, भाजपा के वोट या किसी और के वोट की बात नहीं कर रहे हैं। यह हर किसी का मतदान का अधिकार है और यह जीने का अधिकार है।’’ कथित मतभेदों पर प्रतिक्रिया देते हुए निर्वाचन आयोग ने कहा था कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग विचार और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया है और पिछले एक साल में उसके सभी आदेश ‘‘पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम’’ रहे हैं।


