गोड्डा : गांव में किसी समस्या को सिर्फ परेशानी मानने के बजाय उसे रोजगार के अवसर में बदल दिया जाए तो तस्वीर बदल सकती है। ठाकुरगंगटी प्रखंड के दुतकोल गांव की बेबी देवी ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। आसपास के किसानों को सब्जियों के पौधे खरीदने के लिए दूर बाजार जाना पड़ता था। बेबी देवी ने इसी जरूरत को अपना कारोबार बनाया और गांव में 30×40 फीट की मॉडल नर्सरी स्थापित कर दी। वर्ष 2017 में मां विशहरी स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके भीतर आर्थिक आत्मनिर्भरता की सोच मजबूत हुई। समूह से मिले आंतरिक ऋण और आजीविका संबंधी मार्गदर्शन के सहारे उन्होंने नर्सरी के साथ सब्जी उत्पादन, पॉलीहाउस और बायो रिसोर्स सेंटर जैसी गतिविधियां शुरू कीं।

बेबी देवी को समूह के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से ₹5 हजार, ₹10 हजार और ₹50 हजार का आंतरिक ऋण मिला। कृषि सखी और आजीविका संसाधन व्यक्तियों ने उन्हें बीज उपचार, सुपर कम्पोस्ट और गैर-कीटनाशक प्रबंधन जैसी तकनीकों की जानकारी दी। सोलर पंप और मिनी ट्रैक्टर की सुविधा ने भी खेती को गति दी। इस प्रयास का सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ा। पहले वर्ष उनकी वार्षिक शुद्ध आय ₹59,750 थी, जो दूसरे वर्ष बढ़कर ₹1,33,125 हो गई। यानी शुद्ध आय में ₹73,375 की बढ़ोतरी हुई। बेबी देवी की कहानी इस बात का उदाहरण है कि गांव की स्थानीय जरूरत को पहचानकर उसे व्यवसाय में बदला जाए तो महिला आत्मनिर्भरता के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिल सकती है।


