एचईसी का संकट उसके कर्मचारियों पर बहुत भारी पड़ रहा है

कभी हजारों कर्मचारियों से गुलजार रहने वाला एचईसी आज आर्थिक संकट से जूझ रहा है। केंद्र की मदद से इनकार के बाद वेतन, रोजगार और कंपनी के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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दयानंद राय

कभी 22,000 कर्मचारियों की चहलकदमी से गुलजार रहनेवाला एचईसी बदहाली के दौर से गुजर रहा है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस राज में इसकी स्थिति ठीक थी, उस समय भी यह रेंग-रेंग कर ही चल रहा था लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार के शासनकाल में तो इसने सबसे लंबी और गहरी उपेक्षा झेली है। हाल में ही केंद्र सरकार ने इसे कोई मदद देने से इंकार कर दिया है। यहां सरकार से मतलब भारी उद्योग मंत्रालय से है। दुख की बात तो ये है कि केंद्र सरकार के पास उद्योगपतियों का लाखों करोड़ का कर्ज माफ करने के पैसे हैं, इच्छाशक्ति है लेकिन एचईसी के लिए उसके पास कुछ नहीं है। यहां तक की इसकी स्थिति में सुधार लाने के लिए एक ढंग का आश्वासन भी नहीं है।

भारी उद्योग मंत्रालय ने कहा है कि एचईसी अपने संसाधनों से कार्यशील पूंजी जुटाए और कर्मियों के वेतन और बकाया एरियर का भुगतान करे। अब एचईसी कहां से कार्यशील पूंजी जुटाए और कहां से भुगतान करे। एचईसी की हालत तो ये है कि वो सिवाय केंद्र की बेरुखी पर सिसकने के कुछ नहीं कर सकता। एचईसी के अधिकारियों का 34 महीने का और कर्मचारियों का 30 महीने का वेतन बकाया है। एचईसी में चल रहे संकट के कारण उसके कर्मचारियों की संख्या लगभग 2000 पर आकर सिमट गयी है। एचईसी को करोड़ों के बिजली बिल का भी भुगतान करना है। एचईसी झारखंड ही नहीं पूरे देश का मातृ उद्योग है लेकिन इसे लेकर झारखंड के सांसदों की चुप्पी भी पीड़ादायक है। केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री का कहना है कि उन्हें मंत्रालय के पत्र की जानकारी नहीं है और स्थिति की समीक्षा करने के बाद ही वे कुछ कह पाएंगे।
हर दिन कर्मचारियों पर भारी पड़ रहा है।

इधर, वेतन के अभाव में हर गुजरता दिन एचईसी के कर्मचारियों पर भारी पड़ रहा है। वेतन के अभाव में काम करने की इच्छाशक्ति खत्म हो गयी है। खाने के लाले पड़े हुए हैं और दुकानदारों ने राशन देना तक बंद कर दिया है। घर में कोई बीमार है तो इलाज कराने के भी पैसे नहीं है। पर केंद्र और भारी उद्योग मंत्रालय को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एचईसी मरता है तो मरे, इसके कर्मचारी मरते हैं तो मरे। उनका काम चलता रहेगा। जब एचईसी मरेगा तभी तो इसे एक पूंजीपति को औने-पौने दाम पर बेचने का रास्ता साफ होगा। एचईसी को लेकर केंद्र की चुप्पी खतरनाक है। यहां के सांसदों का रुख और भी खतरनाक। आखिर जमीन बेचकर एचईसी का गुजारा कब तक चलेगा।बाकी सब ठीक है। देश चल रहा है।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।