
सुशोभित
फिल्म ‘कहानी’ (2012) में विद्या बालन का ‘ऑरा’ अद्भुत है। आंख नहीं हटती है। फिल्म में उन्होंने एक गर्भवती महिला की भूमिका निभाई है। अलबत्ता फिल्म के भीतर ही यह मालूम हो जाता है कि वह एक स्वांग था, वे सच में ही गर्भवती नहीं थीं। किन्तु एक हेवीली-प्रेग्नेंट महिला के हाव-भाव, देहभाषा, निष्कवचता के साथ ही उसकी गरिमा-महिमा को उन्होंने सधे-सुरों से निभाया। याद नहीं आता कि किसी और फिल्म में किसी गर्भिणी नायिका ने कथासूत्रों का ऐसे चार्म, आकर्षण और आभामण्डल के साथ संचालन किया हो। फिल्म में तीक्ष्ण-बुद्धि वाली, ग्रेसफ़ुल विद्या अपने स्फीत-उदर के बावजूद जैसे सबको सम्मोहित करती चलती हैं- सबसे ज़्यादा सात्यकी नामक एक भलेमानुष पुलिस सब-इंस्पेक्टर को, जो पूरे समय उनकी धुन पर नाचते नज़र आते हैं। एक स्त्री की मोहिनी का इन्द्रजाल वैसा ही होता है।
फिल्म के अन्तिम दृश्य में सिंदूर-खेला का चित्रण है। उसमें हम विद्या को लाल-पाड़ की बंगाली साड़ी में देखते हैं तो लगता है जैसे वो इसी रूप को धरने के लिए धरती पर आई थीं। हमें याद आता है कि उनकी पहली हिन्दी फिल्म ‘परिणीता’ में भी उन्होंने एक बंग-नारी का चरित्र निभाया था, यों वे स्वयं बंगाली नहीं हैं, तमिल ब्राह्मण हैं। किन्तु सहसा माधबी मुखर्जी की याद आती है, जिन्होंने सत्यजित राय की फिल्मों- ‘महानगर’, ‘चारुलता’, ‘कापुरुष’ में मुख्य भूमिकाएं निबाही थीं। मुझे यह भी महसूस हुआ कि विद्या और माधबी के चेहरे में कुछ साम्य है। देवी दुर्गा का जैसा प्रभावी मुखमण्डल और मुग्ध कर देने वाले नेत्र बंगाली मिथकों पर आच्छादित हैं, उसी की एक झलक वे अपनी नायिकाओं में भी रचना चाहते हैं। शर्मिला ठाकुर को भी उनके वैसे ही भौतिक-रूप के कारण ‘देवी’ की नियति-वंचित भूमिका के लिए सत्यजित राय ने चुना था।
‘कहानी’ मैंने बहुत पहले एक बार देखी थी, इधर जाने किस प्रेरणा से फिर देखना हुआ। किन्तु पहले विद्या की तिलपुष्प-नासिका, स्निग्ध-त्वचा और मुखर-नयनों पर इतना आसक्त नहीं हुआ था। फिल्म की कहानी बहुत कसी हुई, बाँध लेने वाली और उसका फिल्मांकन बहुत विवरण-प्रसूत है। उसे देखते हुए मैं सिनेमा के सम्मोहन के बारे में सोचने लगा, जिसमें आत्म-विस्मृति का सुख है। हम संसार को देखते हैं, संसार से हमारा सम्बंध साक्षात् देखने से बनता है। यह हमारी चाक्षुष-रूढ़ि है। सिनेमा इसका प्रतिरूप रचता है। इसमें देखने की तृष्णा है। हमारी देह की अनेक भूखों के बारे में अकसर बातें होती हैं, लेकिन देखने की अदम्य भूख पर जानें क्यों इतनी चर्चा नहीं हुई है!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

