


ढाका: भारत और बांग्लादेश ने शास्त्रीय संगीत, लोक कला और विरासत संरक्षण सहित विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देने के तरीकों पर चर्चा की। यह चर्चा क्रांतिकारी कवि काजी नजरुल इस्लाम की विरासत को विशेष रूप से रेखांकित करने के लिए ढाका में सालभर आयोजित किए जाने वाले समारोहों के तहत की गई। ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में बताया कि यहां भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने रविवार को बांग्लादेश के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री निताई रॉय चौधरी से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के लोगों के बीच ‘‘गहरे और पुराने सांस्कृतिक संबंधों’’ पर चर्चा हुई।





उच्चायोग ने कहा कि बैठक में दोनों पड़ोसी देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्क और आदान-प्रदान को मजबूत करने के महत्व पर भी चर्चा हुई।
बैठक में सांस्कृतिक मामलों के राज्य मंत्री अली नवाज महमूद खय्याम भी मौजूद थे। भारतीय उच्चायोग ने कहा कि दोनों पक्षों ने शास्त्रीय संगीत, लोक कला, विरासत संरक्षण, संस्थागत संबंधों तथा संयुक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सम्मेलनों के क्षेत्रों में संभावित सहयोग और आदान-प्रदान पर चर्चा की। खास तौर पर काजी नजरुल इस्लाम की विरासत को समर्पित ‘नजरुल बोर्शो’ समारोहों के तहत उस सहयोग को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंधों को और मजबूत करना है।
‘नजरुल बोर्शो’ या ‘नजरुल वर्ष’ बांग्लादेश में 25 मई 2026 से 25 मई 2027 तक मनाया जा रहा है। यह देश के राष्ट्रीय कवि काजी नजरुल इस्लाम की 127वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है। काजी नजरुल इस्लाम को लोकप्रिय रूप से ‘विद्रोही कवि’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 1899 में वर्तमान पश्चिम बंगाल के चुरुलिया में हुआ था। उनकी रचनाओं में स्वतंत्रता, समानता, दमन के खिलाफ प्रतिरोध और सांप्रदायिकता का विरोध प्रमुख रूप से दिखाई देता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके गीत और उनकी कविताएं बंगाल के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई थीं।
पश्चिम बंगाल में आधिकारिक तौर पर उनकी जयंती मनाई जाती है, जबकि चुरुलिया में नजरुल अकादमी के माध्यम से उनकी स्मृति को संरक्षित किया जाता है। उनकी रचनाओं पर आधारित ‘नजरुल गीति’ आज भी बंगाल की संगीत विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सालभर चलने वाले ‘नजरुल वर्ष’ समारोह का उद्देश्य बांग्लादेश में विभिन्न कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय पहलों के माध्यम से काजी नजरुल इस्लाम की साहित्यिक, संगीत और सांस्कृतिक विरासत को लोगों तक पहुंचाना है।
