
यशवंत सिंह
आज सोचता रहा कि क्या पहाड़ में जमीन ले लेने, फ्लैट बना लेने से कोई तन मन में आंतरिक बदलाव आ पाएगा? मन अशांत है तो वह सतही तौर पर विभिन्न चीजों में विभिन्न तरकीबों से शांति और आकर्षण ढूंढने का प्रयास करता ही रहेगा। जीवन छोटा-सा है, इसका एहसास जब हो जाता है तो फिर आंतरिक संन्यास की कोंपले फूटने लगती है। फिर बाहरी जगत का आकर्षण क्रमशः कम होने लगता है। ऐसे में मूल चीज है आंतरिक शांति के लिए सतत अभ्यास करना। इस कड़ी में मुझे लगता है जीवन निर्वाह तो आवश्यक है, पर जीवन का उद्देश्य उससे कहीं बड़ा है!
अच्छा भोजन, अच्छा घर, अच्छे कपड़े और समाज में सम्मान। हममें से अधिकांश लोग जीवन का बड़ा भाग इन चार चीज़ों में लगा देते हैं। सवाल है- इन सबके बाद क्या?
यदि पूरी ज़िंदगी केवल इन्हीं में बीत गई और मन वैसा ही लोभी, क्रोधित, भयभीत और अशांत रहा, तो जीवन का गहरा उद्देश्य अधूरा रह गया। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने जीवनभर धन कमाया। बड़ा घर बनाया। सम्मान भी मिला। लेकिन रात को अकेले बैठने पर उसका मन बेचैन है, ईर्ष्या से भरा है, भय से घिरा है। बहुत तात्कालिक और बहुत फ़ालतू चीज़ों में लीन है। मोबाइल स्क्रीन पर उंगलिया बेवजह नाच रही हैं, आँखें बेवजह स्क्रीन पर शब्दों तस्वीरों चलचित्रों के निरर्थक अंबार में सार्थकता तलाश रही हैं। गौर से ऑब्जर्व करिए, हमारे आपमें आंतरिक स्वतंत्रता कतई नहीं है। हम मानसिक गुलामों सा व्यवहार करते हैं और इसी तरह की ग़ुलाम सोच रखते हैं, मजेदार यह कि इसका एहसास तक नहीं होता हमें। किसी राजनीतिक विचार के लिए, किसी पद के लिए, किसी महत्वाकांक्षा के लिए लगे रहते हैं। कुछ लोग बोलते ही रहते हैं। झूठ सच दिन भर। कुछ लड़ते ही रहते हैं। कुछ लोग खाते ही रहते हैं लगातार। कुछ लोग पीते ही जाते हैं हर शाम! जैसे हम ख़ुद अपने ही नियंत्रण में न हों! कोई चला रहा हमें। हम कठपुतली। प्री प्रोग्राम्ड रोबोट! ऐसे में आंतरिक आज़ादी न मिली तो यात्रा अधूरी है।
बुद्ध के समय भी कुछ भिक्षु ऐसे थे जो संन्यास तो ले चुके थे, पर धीरे-धीरे उनका ध्यान साधना से हटकर सुविधा पर केंद्रित होने लगा। इसीलिए बुद्ध उन्हें स्मरण कराते हैं- संन्यास का उद्देश्य आराम नहीं, जागरण है। मज्झिम निकाय के धम्मदायाद सुत्त में कहा गया है- “यदि कोई भिक्षु केवल भोजन, वस्त्र, निवास और सम्मान पाकर संतुष्ट हो जाए, लेकिन एकांत, ध्यान और चित्त-शुद्धि का अभ्यास न करे, तो उसने अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य खो दिया।” यह शिक्षा केवल भिक्षुओं के लिए नहीं, हम सबके लिए है।
बुद्ध की सूक्ष्म शिक्षा बताती है कि जीवन के साधनों और जीवन के उद्देश्य में अंतर करना चाहिए। भोजन साधन है। घर साधन है। धन साधन है। प्रतिष्ठा भी साधन हो सकती है। लेकिन उद्देश्य क्या है? ऐसा मन विकसित करना जो लोभ, द्वेष और मोह से मुक्त होता जाए। यदि साधन ही उद्देश्य बन जाएँ, तो मन भटक जाता है। रात सोने से पहले अपने आप से पूछता हूँ – “आज मैंने अपने शरीर के लिए क्या किया, और अपने मन के लिए क्या किया?” यदि शरीर के लिए भोजन, काम और आराम किया, तो बहुत अच्छा। लेकिन क्या मन के लिए कुछ किया- पाँच मिनट मौन, या थोड़ी सजगता या किसी के प्रति करुणा या अपने भीतर झाँकना! मुक्तेश्वर (नैनीताल) में प्रकृति की गोद में रहते हुए ऐसा मुझे लग रहा कि मन को क्षणिक बाहरी आकर्षण से मुक्त करना चाहिए। क्या फ्लैट क्या प्लॉट। घूमते रहिए भटकते रहिए। थक जायें तो संसार के किसी हिस्से में कोई कोना पकड़ लीजिए। मौन, उपवास और ध्यान जैसे तीन मंत्रों का अभ्यास जारी रखिए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

