
-
जीवन भर पुरानी कार पर चले, संसाधन रहते हुए भी कभी नई कार नहीं खरीदी
-
शिक्षक, पुलिस प्रशासक और राजनेता के साथ मंत्री की भूमिका में अपने कार्यों से उन्होंने अमिट छाप छोड़ी
-
भूरिया कमिटी के सदस्य के रूप में पेसा कानून बनाने में अहम भूमिका निभायी
दयानंद राय
“हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा”
मशहूर शायर मिर्जा गालिब की ये पंक्तियां आदिवासी समाज के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में से एक रहे बाबा बंदी उरांव पर हूबहू लागू होती हैं। उनका जन्म 16 जनवरी 1931 को अंग्रेजी राज वाले भारत में हुआ था। वे जिस दिन जन्में उस दिन लंदन में गोलमेज सम्मेलन हो रहा था और बाबा साहेब भीमराव अंबेदकर उसकी अध्यक्षता कर रहे थे। बंदी उरांव ने न सिर्फ जनजातीय समाज को उसका हक दिलाने के लिए पेसा कानून बनाने में अहम भूमिका निभायी बल्कि वे इतने ईमानदार थे कि लोग उनकी ईमानदारी की कसमें खाते थे। 5 अप्रैल 2021 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया पर उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी लोगों के जेहन में अमिट है। अजर है, अमर है।

उसूलों से कभी समझौता नहीं किया
बाबा बंदी उरांव को जाननेवाले कहते हैं कि उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया। जब उन्हें लगा कि उनकी नौकरी समाजसेवा के उनके भावी लक्ष्य में बाधा बन रही है तो उन्होंने नौकरी से वीआरएस ले लिया और राजनीतिक जीवन में आ गए। वर्ष 1980 में उन्होंने तत्कालीन पूर्व मंत्री ललित उरांव को पराजित किया और सिसई विधानसभा के विधायक बन गए। जनता को उनपर इतना विश्वास था कि 1980 से 2000 तक वे लगातार विधायक रहे।
पहला विधानसभा चुनाव लड़ने में उन्होंने 20,000 रुपये खर्च किए थे जिनमें से 5000 उन्हें कांग्रेस पार्टी की ओर से मिले थे। बाद में केंद्र की चंद्रशेखर सरकार में वे मंत्री बनाये गए। 1983 से 1985 तक उन्होंने योजना और विकास विभाग का दायित्व संभाला। इसके अलावा उन्होंने विधानसभा की विभिन्न समितियों में अध्यक्ष का दायित्व निभाया। इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण की समिति शामिल है। ट्राइबल एडवाइजरी कमिटी की बैठक में उन्होंने लगातार तीन घंटे तक भाषण दिया था जिसकी मिसाल दूसरी नहीं मिलती।

आदिवासी हितों के लिए आजीवन संघर्ष किया
बंदी उरांव में विनम्रता तो कूट-कूट कर भरी थी पर अपने लक्ष्यों के प्रति वे बेहद स्पष्ट और अडिग थे, सरकारी नौकरी करते वक्त ही उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज की बेहतरी में लगा देंगे और यही उन्होंने किया भी। वे आजीवन आदिवासी हितों के लिए संघर्षरत रहे। भूरिया कमिटी के सदस्य के रूप में उन्होंने पेसा कानून बनाने में अहम योगदान दिया। अनुसूचित क्षेत्र के लिए बने पेसा कानून को वे अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते रहे और उस कानून को अमली जामा पहनाने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया।

एसपी थे पर एसपी की ठसक को कभी हावी नहीं होने दिया
बाबा बंदी उरांव एक किसान पिता की संतान थे, अपनी मेहनत और प्रतिभा से उन्होंने ऊंचा ओहदा पाया, एसपी बने पर एसपी की ठसक को अपने जीवन में कभी हावी नहीं होने दिया। एसपी रहते वे सामान्य जीवन जीते रहे। सादा जीवन, उच्च विचार का आदर्श उनमें जीवनपर्यंत रहा। एसपी रहते वे गाय पालते थे और दाल रोटी खाते थे। आधी बांह का कुर्ता-पायजामा उनका पसंदीदा पहनावा रहा। दिखावा उन्हें कभी छू भी नहीं सका। वे छोटे-बड़े सभी को समान महत्व देते थे और सबके लिए काम करने में उनका विश्वास था।
किसान पिता की काबिल संतान थे बंदी उरांव

झारखंड के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करनेवाले बंदी उरांव के पिता एक किसान थे। खेती-बारी करके वे अपने परिवार की जीविका चलाते थे, पर उनका सपना था कि उनका बेटा बड़ा होकर अफसर बने, बंदी उरांव ने अपने पिता का न सिर्फ अफसर बनने का सपना पूरा किया बल्कि राजनीति और कार्यशैली से ऐसी छाप छोड़ी की वे जन-जन के प्रिय बन गए।
बंदी उरांव की शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई। गुमला जिले के भरनो प्रखंड में जन्मे बंदी उरांव ने गांव से निकलकर आगे की पढ़ाई रांची जिला स्कूल से की। यहां से वे प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास हुए और आगे की पढ़ाई पटना साइंस कॉलेज और बाद में पटना विश्वविद्यालय से की। बीए पास करने के बाद बीपीएससी के जरिये उनका चयन पुलिस सेवा के लिए हो गया। 1956 में वे डीएसपी बने और बाद में उनकी प्रोन्नति आइपीएस में हो गयी।
अविभाजित बिहार में नवनिर्मित सीतामढ़ी जिले का उन्हें पहला एसपी बनने का मौका मिला। वर्ष 1980 में जब गिरिडीह के एसपी के पद से उन्होंने वीआरएस लिया तो उनका वेतन केवल 2000 रुपये मासिक था।
