
पुष्यमित्र
मैं बहुचर्चित सेलिब्रिटियों के आकर्षण में कम रहता हूं। एक तो वे ओवर एक्सपोज्ड रहते हैं, दूसरा लगातार पब्लिक अपीयरेंस की वजह से वे बनावटी हो जाते हैं। मगर कल शाम राजकमल के किताब उत्सव में जावेद अख्तर को सुनकर लगा कि वे अलग ही इंसान हैं। अभी भी उनमें ईमानदारी और समझदारी बची हुई है। दिल से बातें करते हैं। प्रत्युत्पन्नमतित्व तो गजब का है।
कल का यह किस्सा लंबे समय तक याद रहेगा। बातचीत के दौरान ही एक व्यक्ति ने कहा कि मैं अपना नाम नहीं लूंगा, नहीं तो सब समझ जाएंगे कि मैं मुसलमान हूं।
उस व्यक्ति को जावेद साहब ने प्यार से डांटा और कहा कि अब दुबारा कभी ऐसा मत कहिएगा। आपको एहसास नहीं है कि आप कैसे राज्य में रहते हैं। यह अलग ही दुनिया है। अभी मैं बाहर निकला तो देखा कि किताबों की एक दुकान का नाम किताबगाह है। क्या यह किसी दूसरी जगह मुमकिन है। यहां के लोगों का स्वभाव ही अलग है। वहीं दूसरी तरह जब उन्होंने खुद के पोर्क खाने का प्रकरण सुनाया तो उनके लिए फिक्र होने लगी। ऐसा लगा कि क्या इस बदलती दुनिया में अपने इस तरह के अनुभवों के साथ वे चैन से रह पाएंगे।
वे पूरी तरह नास्तिक हैं। हिंदुओं में नास्तिक होना आसान है, मुसलमानों में नास्तिक होना उतना आसान नहीं होता। मगर वे अपनी नास्तिकता और तार्किकता के साथ इस दुनिया में मजबूती से बने हुए हैं। अच्छा लगा आपको सुनकर। कुछ मुझे भी पूछना था, मगर हिम्मत नहीं हुई।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

