NEWS AROMA ANALYSIS: असम में विधानसभा चुनाव लड़कर क्या हासिल करना चाहते हैं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

झामुमो के नेतृत्व में हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन असम विधानसभा चुनाव में आदिवासी और चाय जनजाति समुदायों को केंद्र में रखते हुए पार्टी की राजनीतिक ताकत बढ़ा रहे हैं।

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कल्पना सोरेन बतौर स्टार प्रचारक कितनी मजबूती से बात रख रही हैं असम विधानसभा चुनाव में

असम की 126 विधानसभा सीटों में लगभग 40 सीटों पर आदिवासी और चाय जनजाति समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं

चाय बागानों में करीब 35 लाख ऐसे मतदाता हैं जिनका मुख्यत: पूर्वी असम के 35 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में दबदबा है तथा वे असम की 126 सदस्यीय विधानसभा की कम से कम दस और सीटों के चुनाव नतीजे पर भी असर डाल सकते हैं

असम में नौ अप्रैल को विधानसभा चुनाव है और मतगणना चार मई को होगी

दयानंद राय

रांची : झारखंड के राजनीतिक हलकों में यह सवाल बड़ी शिद्दत से उठ रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन असम में विधानसभा चुनाव लड़कर क्या हासिल करना चाहते हैं। कांग्रेस के इच्छा जाहिर करने के बाद भी उन्होंने उसके साथ गठबंधन क्यों नहीं किया और असम में पार्टी को मजबूत करने की रणनीति में वे कितने सफल होंगे?

तो आइए, इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं। तो पहला कारण तो ये है कि झामुमो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राष्ट्रीय पार्टी का टैग हासिल करना चाहती है और इसलिए भी पार्टी असम विधानसभा चुनाव में अपना दमखम आजमा रही है। असम के अलावा पार्टी उड़ीसा और दूसरे राज्यों में भी अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। दूसरी बड़ी वजह ये है कि असम के आदिवासी बहुल सीटों में पार्टी को अपनी राजनीतिक जमीन दिख रही है जहां उम्मीदों का खाद-पानी देकर वो अपना परचम लहरा सकती है। असम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, गांडेय विधायक और सीएम की पत्नी कल्पना सोरेन समेत अन्य नेताओं ने चुनाव प्रचार में यही किया भी है, उन्होंने असम के चाय बगानों के आदिवासी भाई बहनों की दयनीय स्थिति का मु्द्दा उठाया है। यह मु्द्दा असम में आदिवासी समुदाय के लोगों को टच कर भी रहा है और अब ये देखना दिलचस्प होगा कि हेमंत सोरेन और झामुमो के नेताओं की अपील को असम के टी ट्राइब ने कितनी गंभीरता से लिया है।

असम विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बाद सबसे प्रभावी नेत्री के रुप में कल्पना सोरेन की उपस्थिति रही है। असम के चाय बगानों में काम करनेवाले मजदूरों की नब्ज पकड़ने की उन्होंने पूरी कोशिश की है। झामुमो ने असम में जय भारत पार्टी (जेबीपी) को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की है। इस गठबंधन का मकसद असम के आदिवासी और चाय जनजाति समुदायों की लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान करना है। इस राजनीतिक पहल को उन पूर्व आदिवासी उग्रवादी संगठनों के सदस्यों का भी खुला समर्थन मिला है, जो अब मुख्यधारा में लौट चुके हैं। विशेष रूप से साहिल मुंडा, जो पहले एक उग्रवादी संगठन के शीर्ष नेता रह चुके हैं। वे सरूपथार विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं।

उनके नेतृत्व में कई पूर्व सदस्य इस बार जय भारत पार्टी और झामुमो के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में यह गठबंधन इन सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगा और लोकसभा चुनाव में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेगा। उनका मानना है कि आने वाले समय में जय भारत पार्टी और झामुमो असम की राजनीति में एक अहम शक्ति बनकर उभरेंगे। गठबंधन ने स्पष्ट किया है कि उनका मुख्य लक्ष्य आदिवासी और चाय जनजाति समुदायों को वर्षों से झेल रहे शोषण और उपेक्षा से मुक्त कराना है। विशेष रूप से जनजातीय दर्जा (एसटी स्टेटस) दिलाने और अन्य बुनियादी समस्याओं के समाधान पर जोर दिया जा रहा है।

सहिल मुंडा ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले तीन वर्षों में आत्मसमर्पण कर चुके कई आदिवासी उग्रवादियों को सरकार की ओर से कोई पर्याप्त सहायता नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि इनमें से कई लोग आज दिहाड़ी मजदूरी कर जीवनयापन करने को मजबूर हैं। पार्टी के नेताओं के अनुसार, उनका चुनाव में उतरने का मुख्य उद्देश्य अपने समुदाय की वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान करना है। सहिल मुंडा ने कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है और असम की लगभग 40 विधानसभा सीटों पर आदिवासी और चाय जनजाति समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

करीब दो साल पहले असम के विभिन्न आदिवासी संगठनों, समूहों और समुदायों के सहयोग से गठित जय भारत पार्टी को अब झामुमो का मजबूत साथ मिला है। दोनों दल मिलकर एक साझा मंच पर चुनाव लड़ रहे हैं और राजनीतिक शक्ति हासिल कर समुदायों के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को हल करने की रणनीति बना रहे हैं। इस विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन 18 सीटों पर संयुक्त उम्मीदवार उतार चुका है, जो असम की राजनीति में एक नई दिशा की ओर संकेत करता है।

 

 

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।