रांची: झारखंड में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं लगातार चिंता का विषय बनती जा रही हैं। रांची के कांके स्थित केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीआईपी) में बीते एक वर्ष के भीतर 1 लाख 17 हजार से अधिक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित मरीज इलाज के लिए पहुंचे हैं। इनमें से गंभीर स्थिति को देखते हुए 4,418 मरीजों को अस्पताल में एडमिट करने की आवश्यकता पड़ी।

विशेषज्ञों के अनुसार, दैनिक जीवन में बढ़ता तनाव, घरेलू समस्याएं और समय पर उचित इलाज का न मिल पाना मानसिक परेशानियों को गंभीर रूप देने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
डॉ. संजय मुंडा के अनुसार, मानसिक रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी का एक मुख्य कारण बीमारी को शुरुआती चरण में न पहचान पाना है। लोग अक्सर शुरुआती लक्षणों को सामान्य समझकर लंबे समय तक नजरअंदाज करते रहते हैं। कई मामलों में मरीज या उनके परिजन आधुनिक चिकित्सीय इलाज कराने के बजाय झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं, जिससे स्थिति काफी गंभीर हो जाती है और अंततः मरीज को अस्पताल लाना पड़ता है।
उन्होंने समाज में फैले भेदभाव और भ्रांतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज भी मानसिक रोग से ग्रसित व्यक्तियों को अलग नजरिए से देखा जाता है। समाज का यह रवैया मरीजों को अपनी परेशानी साझा करने और मदद मांगने से रोकता है। इसलिए समाज को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक संवेदनशील होने और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।
राज्य में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा आत्महत्या के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2019 से 2024 के बीच झारखंड में कुल 11,794 लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें से अकेले वर्ष 2024 में ही 1,991 मामले दर्ज किए गए।


