गुजरात में चुनाव न लड़नेवाली पार्टियों को कैसे मिला करोड़ों का चंदा : विनोद पांडेय

झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों को मिले हजारों करोड़ के चंदे पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाए।

4 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

रांची : झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने गुजरात में चुनाव न लड़नेवाली पार्टियों को मिले करोड़ों के चंदे पर सवाल उठाएं हैं। उन्होंने कहा है कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण खबर सोशल मीडिया में लगातार ट्रेंड कर रही है, कई ऐसी पार्टियां हैं जो रजिस्टर्ड तो हैं लेकिन अनरिकॉग्नाइज्ड (गैर-मान्यता प्राप्त) पार्टी के रूप में जानी जाती हैं। आप लोगों को मालूम है कि देश में 2800 से ज्यादा पार्टियां रजिस्टर्ड हैं, जिसमें 6 पार्टियों को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है और 67 पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियां हैं। बाकी सभी पार्टियां रजिस्टर्ड हैं, अनरिकॉग्नाइज्ड हैं। बीबीसी की तरफ से एक समाचार चलाया जा रहा है। उस समाचार को आप लोगों ने भी देखा होगा और हम लोगों ने भी देखा। काफी नज़दीक से उसको जानने-समझने का अवसर हम लोगों को मिला।

इन पार्टियों को लगातार सैकड़ों करोड़ चंदा मिलता है। वो पार्टियां चुनाव नहीं लड़ती हैं, उनका कोई पॉलिटिकल एक्टिविटी नहीं है, किसी का दफ्तर दुकान में है जहाँ शटर बंद है, किसी का दफ्तर फ्लैट के एक रूम में है जहाँ ताला बंद है। तहकीकात करने के बाद जो बातें सामने आईं, उसमें स्पष्ट रूप से आया कि किसी के खाते में 1,000 करोड़ रुपया है, किसी के खाते में 620 करोड़ रुपया है, किसी के खाते में 950 करोड़ रुपया है, और सबसे कम जिस पार्टी के खाते में पैसा है, वह 138 करोड़ रुपया है। कुछ राष्ट्रीय पार्टी को छोड़कर किसी के खाते में इतना पैसा नहीं होगा। तो आखिर इन पार्टियों का उपयोग और दुरुपयोग कैसे हो रहा है? कौन कर रहा है? यह सवाल उठता है।

2023-24 में इन पार्टियों को इतना पैसा मिला है। मैंने इसलिए यह सवाल उठाया कि आखिर चुनाव आयोग कहाँ है? आयकर विभाग कहाँ है? हर मामले को ईडी और सीबीआई को देने की बात होती है, तो फिर इन मामलों को संज्ञान में यह एजेंसियां क्यों नहीं लेती हैं? सवाल यह उठता है। उन पार्टियों का नाम भी अगर बताएं, तो ‘लोक साही सत्ता पार्टी’-उनको जो पैसा मिला है, 1,045 करोड़ रुपया, और यह 2023-24 का मामला है। आप कल्पना कर सकते हैं, ऐसी 10 पार्टियां हैं। इसलिए यह सवाल बनता है कि अगर इन पार्टियों को इतना चंदा मिलता है, इतना सहयोग मिलता है, तो लोग इन पार्टियों के बारे में जानते क्यों नहीं? इनका कोई राजनीतिक कार्यक्रम क्यों नहीं होता? ये चुनाव क्यों नहीं लड़ते? और नहीं लड़ते हैं, तो फिर ये खर्चा दिखाते कैसे हैं? जिस पार्टी को 1,045 करोड़ रुपया मिला, उस पार्टी ने 900–950 करोड़ रुपया खर्च दिखाया, इनकम टैक्स को रिटर्न भरा और चुनाव आयोग को खर्चे का ब्योरा दिया।

अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं। मेरा सीधा सवाल है कि यह जो हजारों करोड़ का चंदा पार्टियों को मिला है, कहीं यह मनी लॉन्ड्रिंग का मामला तो नहीं है? क्या इसकी जांच होगी? जो लोग चंदा देते हैं या दे रहे हैं, उनके चेहरे कब बेनकाब होंगे? यह जांच एजेंसियों से मेरा सवाल है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन काले धनों से, जो पूरे देश में एक माहौल है विधायक-सांसद खरीदने का, उसका इस्तेमाल तो नहीं होता है? इस पूरे मामले पर चुनाव आयोग मूकदर्शक क्यों बना हुआ है? क्यों जांच एजेंसियां मूकदर्शक बनी हुई हैं? क्यों आयकर विभाग ने अभी तक इसे संज्ञान में नहीं लिया?

Share This Article
विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।