दयानंद राय
एल ख्यांगते को क्या कमी थी। सीनियर आइएएस ऑफिसर रहे हैं। राज्य के मुख्य सचिव की भूमिका का निर्वाह कर चुके थे। दौलत और रसूख दोनों उनके पास थी। इसके बाद भी भ्रष्टाचार के दलदल में धंसने की उन्हें क्या जरूरत थी। उनपर टीडीपीएल से दो करोड़ और 20 प्रतिशत कमीशन लेने के आरोप हैं। अब सीआइडी उन्हें इस मामले में गिरफ्तार कर चुकी है। अब, सीआइडी को कुछ सबूत तो मिले होंगे, ऐसे ही तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है। सवाल यह उठता है कि आखिर वो क्या परिस्थितियां रही होंगी कि उन्हें कथित रुप से घूसखोरी पर मजबूर होना पड़ा। आइएएस अधिकारी रहते उन्होंने ठीक-ठाक पैसा कमाया था। इतना धन तो उनके पास था ही कि जीवन निर्वाह आराम से हो जाता, लेकिन नहीं। पैसे का लालच बढ़ता गया होगा।

सोचा होगा कि मौका मिला है तो लगे हाथों थोड़ा और बटोर लें, आखिर जेपीएएसी के अध्यक्ष हैं और जेपीएससी को इसके अध्यक्षों के लिए दुधारु गाय रही है। पूर्व में भी इसके अधिकांश अध्यक्ष और सदस्य जेपीएससी की कृपा से मालामाल होते रहे हैं। हालांकि, ऐसे भ्रष्टों की वजह से जेपीएससी की साख पर बट्टा लगता रहा है और इसका खामियाजा जेपीएससी की परीक्षाओं से अफसर बनने का सपना देखनेवाले छात्र भुगतते रहे हैं। क्या एल ख्यांगते भूल गए थे कि जेपीएससी उनके करियर में ऐसा दाग लगाने जा रही है जो उनके जीवन से कभी नहीं हट पायेगी। हो, सकता है कि वे सोच रहे होंगे कि इतना रसूख है कि कोई कुछ नहीं बोलेगा। भ्रष्टाचार के कितने ही मामले हैं झारखंड में सब पकड़े थोड़े गए हैं। लेकिन, अब जब सीआइडी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है तो उनके करियर पर कालिख तो लग ही गयी है। हो सकता है कि बाद में वे जमानत पर छूट जाएं, पर जेपीएससी के भ्रष्ट अध्यक्ष के तौर पर लगा बदनामी का दाग उनके माथे से कभी नहीं जायेगा।


