सुशोभित
नर्मदा की सहायक-नदियों के नाम बड़े चित्र-विचित्र हैं। नर्मदा में शेर नदी भी आकर मिलती है और हिरण नदी भी! बाघ नदी भी और हथिनी नदी भी! हो भी क्यों ना? वह वन्या-अरण्या जो है। वनप्रवाहिनी जो है। मैदानों में कम और जंगलों-पहाड़ों में अधिक बहती है। उसके तट पर शेर, बाघ, हाथी, हिरण तो मडलाएंगे ही! यह तो हो गए वन्यजीव। अब थोड़ा रसोई का सामान देख लें। तो नर्मदा में शक्कर नदी भी मिलती है और खारी नदी भी। दूधी नदी भी उसी में आकर समाहित हो जाती है। घर-गृहस्थी का सामान चाहिए? यह लीजिये : तवा नदी, छोटी तवा नदी, कुंडी नदी आदि-इत्यादि।
नर्मदा में आकर मिलने वाली 41 प्रमुख नदियों की सूची बनाई गई है, 22 दक्षिण-तट पर और 19 उत्तर-तट से। किन्तु छोटी नदियों की तो कोई गणना ही नहीं है, जैसे अंजनी, कुब्जा, वेदा, कपिला, झलकन, जामदी, हथेड़, मारू, राइन। नर्मदा की पहली बड़ी सहायक-नदी खरमेर है। बुढ़नेर तो अपनी भर-जवानी में आकर उसमें मिलती है, इस पर विनोदप्रिय वेगड़जी की टिप्पणी थी कि इस नदी का नाम ‘युवनेर’ होना चाहिए था। नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक-नदी तवा है, जो बुदनी-बांद्राभान में उससे आकर मिलती है। संगम के समय तवा का पाट अधिक चौड़ा है, किन्तु उसने नर्मदा जी में अपनी पहचान मिला दी है। भला कौन वैसा ना करेगा? अपनी अस्मिता को नर्मदा जी में सिरा ही देना चाहिए।
नर्मदा की सबसे लम्बी सहायक नदी हिरण है। नाम ही हिरण है तो लम्बी कुलाँचे तो इसे भरनी ही थीं! एक और बड़ी नदी है- बंजर। अब आप ही बतलाइये, शस्य-श्यामला भूमि को सिंचित करने वाली नदी का वैसा नाम जाने क्यूँ रखा गया होगा? मंडला नगर नर्मदा-बंजर संगम पर ही बसा है।ओंकारेश्वर में कावेरी-संगम है, लेकिन संगम-स्थल वहाँ नहीं है जहाँ कावेरी आकर मिलती है। मान्धाता पर्वत के कारण दो धाराओं में बँटी नर्मदा जिस बिंदु पर स्वयं से ही फिर मिल जाती है, वहाँ कावेरी-संगम मानते हैं। कहते हैं कावेरी से नर्मदा की अनबन हो गई थी तो दोनों रूठी-रूठी अलग बहती रहीं, फिर आगे जाकर नर्मदा ने अपनी छोटी बहन को मना लिया।
सोकलपुर में नर्मदा-शक्कर संगम है। शक्कर नदी गाडरवारा से होकर यहाँ आती है। गाडरवारा में कभी रहने वाले रजनीशचंद्र मोहन ने शक्कर नदी के किनारे शक्कर सरीखे मीठे खरबूज़ों की खेती के बारे में बड़ा स्वादिष्ट वृत्तान्त अपने बाल्य-जीवन के संस्मरणों में दिया है। कालान्तर में ये ही महाराज ओशो कहलाए। गाडरवारा से जबलपुर तक की उनकी जीवन-यात्रा को शक्कर से नर्मदा तक की ही यात्रा समझें। बरमानघाट से पहले शेर नदी नर्मदा जी में मिलती है। संडिया से पहले दूधी नदी। गोंडागाँव में गंजाल। बरगी में सरई। यह अनन्त-कथा है!
मेरा शरीर तो मनुष्य का है, नदी का नहीं है। मेरी धमनियों-शिराओं में भले राग-रुधिर की लीला हो, पर स्वयं मुझमें नदी-सा प्रवाह कहाँ? किन्तु अगर देहोत्सर्ग के उपरान्त मेरी अस्थियाँ नर्मदा जी में प्रवाहित की गईं तो समझ लूँगा कि मेरे भीतर की नदी भी नर्मदा जी में जा मिली है- फिर चाहे उसे बालई कह लो या कह लो बुढ़नेर!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

