


अशोक कुमार पांडेय
मौतें अब इतनी सामान्य बन चुकी हैं कि बस ख़बर हैं। जोड़ते जाइए किसके शासन में बनी वह बिल्डिंग, कब इजाज़त वापस ली गई, कब मिली और फिर पार्टी-पार्टी खेलिए। हक़ीक़त यह है कि राजनीति से आगे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अपनी कुर्सी बचाने में परेशान प्रधानमंत्री गोली देकर इतने खुश हैं कि गोली चल जाए तो भी फ़र्क़ नहीं पड़ता। संयोग से मिली कुर्सी पर बैठीं मुख्यमंत्री फोटो खिंचवाकर संतुष्ट हैं, कोई जवाबदारी नहीं मांगने वाला। मीडिया का दर्द बस इतना है कि मालिक पर आंच न आए।





अवैध कॉलोनियों और ऐसे मकानों में छात्र इसलिए नहीं रहते कि उन्हें मज़ा आता है, इसलिए रहते हैं कि सरकारें उन्हें ढंग का हॉस्टल देने में नाकामयाब हैं। सवाल पूछिए- देश की राजधानी की दिल्ली यूनिवर्सिटी में आखिरी हॉस्टल कब बना था, जवाब मिल जाएंगे आपको। शिक्षा को जब व्यापार बना दिया जाएगा, तो छात्र मजबूर ग्राहक से ज़्यादा क्या समझे जाएंगे? इतिहास बदलने को व्याकुल सरकारें, वर्तमान और भविष्य को अंधेरे में धकेल रही हैं और समाज तालियाँ बजा रहा है।
बात दिल्ली की थी तो ख़बर बनी, किसी छोटे शहर-क़स्बे की होती तो किसी अखबार के पाँचवे पन्ने पर विज्ञापनों के मलबे में दब जाती।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
