सोन के पानी का बंटवारा-क्या इस सूखे नहर में रबी के मौसम में पानी आयेगा?

बिहार-झारखंड के बीच सोन नदी जल बंटवारे पर समझौता हुआ, लेकिन इंद्रपुरी बांध और सूखे मौसम में जल उपलब्धता को लेकर कई गंभीर सवाल अब भी सामने हैं।

3 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

पुष्यमित्र

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में बिहार और झारखंड के सीएम सोमवार को दिल्ली में मिले और सोन नदी के पानी के उस बंटवारे के समझौते पर साइन कर दिये, जिसकी सहमति काफी पहले बन गई थी। जो हुआ वह एक औपचारिकता भर थी, क्योंकि इस साल फरवरी में बिहार कैबिनेट में यह घोषणा कर दी गई थी कि बंटवारे में बिहार को 5.75 मिलियन एकड़ फीट और झारखंड को 2 मिलियन एकड़ फीट पानी मिलेगा। इससे भी पहले 2025 के पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में सहमति बन गई थी। इसलिए अभी की सरकार अगर इसका क्रेडिट ले रही है, तो वह इन तथ्यों को नजरअंदाज कर रही है।

सवाल यह भी है कि इस समझौते के बाद क्या बदलेगा, इससे पहले सोन का कितना पानी किस राज्य को जाता था। सच यह है कि अभी तक इसे मापा नहीं जा रहा था कि किस राज्य के खाते में कितना पानी जा रहा है। आपत्ति की एक ही वजह थी, बिहार-झारखंड सीमा पर प्रस्तावित इंद्रपुरी जलाशय परियोजना. बिहार चाहता था कि यह परियोजना बन जाये तो वहां इतना पानी रोका जा सके कि सूखे के मौसम में भी मगध और शाहाबाद के किसानों को सिंचाई का पानी मिल सके। मगर झारखंड हर बात अपना हिस्सा मांगता और कहता कि जब तक उसका हिस्सा तय नहीं होगा, वह डैम बनाने नहीं देगा।

यह डैम डेहरी ओन सोन स्थित इंद्रपुरी बराज से 70 किमी ऊपर बनने वाला है और माना जा रहा है कि इस समझौते के बाद 1972 से प्रस्तावित इस बांध का निर्माण शुरू किया जा सकेगा। मगर सवाल यह भी है कि डैम बनने में कितना समय लगेगा और डैम बनने के बाद क्या सोन की सूखी नहरों में जनवरी से अप्रैल के बीच पानी आ सकेगा? आकलन बताता है कि सोन की मौजूदा नहरों में पानी की आपूर्ति के लिए कम से कम 13000 क्यूसेक जल प्रवाह चाहिए। जबकि सोन में बिहार के इलाके में लीन पीरियड में औसतन 9000 क्यूसेक पानी का ही प्रवाह रहता है. ऐसे में वह खुद क्या रखेगा और झारखंड को क्या देगा, यह भी देखना होगा।

साथ ही यह भी कि जिस 5.75 मिलियन एकड़ फीट पानी बिहार को मिलने की बात कही जा रही है, कहीं वह कागजी न हो। सच यही है कि कागज पर पानी बांट कर सोन पर एक नया बांध बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। मगर सोन में क्या उतना पानी बचा है? क्या सोन एक और बांध झेलने को तैयार है? क्या इन सवालों के बारे में भी सोचा गया है?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Share This Article
विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।