

पुष्यमित्र





केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में बिहार और झारखंड के सीएम सोमवार को दिल्ली में मिले और सोन नदी के पानी के उस बंटवारे के समझौते पर साइन कर दिये, जिसकी सहमति काफी पहले बन गई थी। जो हुआ वह एक औपचारिकता भर थी, क्योंकि इस साल फरवरी में बिहार कैबिनेट में यह घोषणा कर दी गई थी कि बंटवारे में बिहार को 5.75 मिलियन एकड़ फीट और झारखंड को 2 मिलियन एकड़ फीट पानी मिलेगा। इससे भी पहले 2025 के पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में सहमति बन गई थी। इसलिए अभी की सरकार अगर इसका क्रेडिट ले रही है, तो वह इन तथ्यों को नजरअंदाज कर रही है।
सवाल यह भी है कि इस समझौते के बाद क्या बदलेगा, इससे पहले सोन का कितना पानी किस राज्य को जाता था। सच यह है कि अभी तक इसे मापा नहीं जा रहा था कि किस राज्य के खाते में कितना पानी जा रहा है। आपत्ति की एक ही वजह थी, बिहार-झारखंड सीमा पर प्रस्तावित इंद्रपुरी जलाशय परियोजना. बिहार चाहता था कि यह परियोजना बन जाये तो वहां इतना पानी रोका जा सके कि सूखे के मौसम में भी मगध और शाहाबाद के किसानों को सिंचाई का पानी मिल सके। मगर झारखंड हर बात अपना हिस्सा मांगता और कहता कि जब तक उसका हिस्सा तय नहीं होगा, वह डैम बनाने नहीं देगा।
यह डैम डेहरी ओन सोन स्थित इंद्रपुरी बराज से 70 किमी ऊपर बनने वाला है और माना जा रहा है कि इस समझौते के बाद 1972 से प्रस्तावित इस बांध का निर्माण शुरू किया जा सकेगा। मगर सवाल यह भी है कि डैम बनने में कितना समय लगेगा और डैम बनने के बाद क्या सोन की सूखी नहरों में जनवरी से अप्रैल के बीच पानी आ सकेगा? आकलन बताता है कि सोन की मौजूदा नहरों में पानी की आपूर्ति के लिए कम से कम 13000 क्यूसेक जल प्रवाह चाहिए। जबकि सोन में बिहार के इलाके में लीन पीरियड में औसतन 9000 क्यूसेक पानी का ही प्रवाह रहता है. ऐसे में वह खुद क्या रखेगा और झारखंड को क्या देगा, यह भी देखना होगा।
साथ ही यह भी कि जिस 5.75 मिलियन एकड़ फीट पानी बिहार को मिलने की बात कही जा रही है, कहीं वह कागजी न हो। सच यही है कि कागज पर पानी बांट कर सोन पर एक नया बांध बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। मगर सोन में क्या उतना पानी बचा है? क्या सोन एक और बांध झेलने को तैयार है? क्या इन सवालों के बारे में भी सोचा गया है?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
