
रांची : श्री लंगटा बाबा के आवास की व्यवस्था विचित्र थी।वे अधिकतर बारहों महीने खुले आसमान के नीचे रहा करते थे। यदि आराम करने की विशेष इच्छा हुई तो अतिनिकट के तत्कालीन थाने के बरामदे में सो रहते। यहां यह कह देना आवश्यक है कि आज थाना (पीएस) जमुआ है, जो वहां से 4 मीलों की दूरी पर है। पर उन दिनों थाने का बंगला खरगडीहा में ही था। जो दो बड़े-बड़े मकानों के रूप में अभी भी वर्तमान है। उनकी शय्या के रूप में कुछ पुआल, बोरे, कंबल आदि ही रहा करते थे। परंपरा से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार वे उनके प्रभावों से परिचित रहा करते थे। इन्हें थाने के बंगले से कोई हटाने की इच्छा भी नहीं रखता था। लोग सोचते – जलती हुई आग में कौन हाथ डालने जाय? कहते हैं, कोई पुलिस सुपरिटेंडेंट आये। वे गोरे साहब थे।
कोई काला हिन्दुस्तानी असभ्य और अभद्र तरीके से रहने वाला, सरकारी बंगले में अनाधिकार कब्जा बनाये रहे! इसे वे सहन नहीं कर सके। तत्कालीन दारोगा जी को उन्होंने इस बात पर बहुत फटकार जताई, और कहा कि इस पगले को यहां से जितनी जल्दी हो सके, हटा दो। दारोगा ने बहुत मिन्नतें की कि हुजूर, इन्हें मत छेड़िये, ये ऊंचे दर्जे के फकीर हैं। गोरे एसपी ने कुछ नहीं सुना। ‘ऑर्डर’ लिख दिया और वे हजारीबाग (जिला केंद्र) चले गये। दारोगा ने उस काले हुक्म को तामील कर देने में कोई जल्दबाजी नहीं की। सुनते हैं, ज्योहीं वे अपने ऑफिस पहुंचे, उन्हें अपने ऊपरी ऑफिसर का आदेश पत्र मिला। जिसके अनुसार उन्हें सर्विस से हटा दिया गया था। इस घटना के बाद किसी ने लंगटा बाबा को उस स्थान से हटाने का दु:साहस नहीं किया।
