जब देश चंद्रमा पर पहुंच रहा है, तब हमारे बच्चे टेबल-बेंच के लिए तरस रहे हैं। ये तस्वीर सिर्फ लापरवाही नहीं, एक पीढ़ी के सम्मान पर सवाल है: ग्रामीण

महुआडांड़ के सरकारी स्कूलों में करोड़ों के शिक्षा बजट के बावजूद बच्चे फर्श, बोरा और चटाई पर पढ़ने को मजबूर हैं, टेबल-बेंच की मांग अब भी अधूरी है।

News Aroma
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करोड़ों का बजट, पर नसीब में अब भी फर्श ,टेबल-बेंच के इंतजार में बोरा-चटाई पर बैठकर सपना बुन रहे महुआडांड़ के लाल

महुआडांड़ सरकार शिक्षा पर हर साल करोड़ों खर्च करने का दावा करती है। पर प्रखंड के अंबाकोना, काठो और टुकू डीह स्कूल की कक्षाओं में घुसते ही वो दावा चूर-चूर हो जाता है।यहां दीवारों पर स्मार्ट शिक्षा के पोस्टर लगे हैं, और फर्श पर फटे बोरा-चटाई। कहीं एक भी टेबल-बेंच नहीं है कहीं जो टूटे-फूटे पड़े हैं उनमें बैठना खतरे से खाली नहीं। 20बच्चों की क्लास में 10 बच्चे जमीन पर। छोटी बच्चियां अपनी ड्रेस संभालकर बैठती हैं, छोटे बच्चे स्याही से सने हाथों से कॉपी संभालते हैं। बरसात में नमी, गर्मी में तपन, सर्दी में ठंड पर पढ़ाई का जज्बा कम नहीं हुआ एक शिक्षिका की आंखें भर आईं बच्चे शिकायत नहीं करते। बस रोज पूछते हैं मैडम, इस बार टेबल-बेंच आएगा क्या !ग्रामीणों का दर्द है – फाइलों में फर्नीचर पास हो जाता है, पर स्कूलों तक नहीं पहुंचता!ग्रामीणों के साथ बच्चों ने जिला प्रशासन से तत्काल स्कूलों में टेबल बेंच की व्यवस्था की मांग की है

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