
नई दिल्ली : देश में एक राज्य से दूसरे राज्य में बसने वाले लोगों के लिए अपनी पुरानी गाड़ी साथ ले जाना अब किसी बड़ी जंग को जीतने जैसा नहीं होगा। नीति आयोग ने केंद्र सरकार को एक क्रांतिकारी सुझाव दिया है, जिसके तहत वाहनों के अंतरराज्यीय हस्तांतरण (इंटरस्टेट ट्रांसफर) के लिए अनिवार्य ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (एनओसी) की फिजिकल प्रक्रिया को पूरी तरह समाप्त करने की बात कही गई है। यदि केंद्र इस सिफारिश को हरी झंडी देता है, तो वाहन मालिकों को आरटीओ के चक्करों और दलालों के चंगुल से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। नीति आयोग का मानना है कि ‘डिजिटल इंडिया’ के इस दौर में जब सारा डेटा ऑनलाइन उपलब्ध है, तो कागज के टुकड़ों के लिए हफ्तों इंतजार करना तर्कसंगत नहीं है। आयोग का प्रस्ताव है कि ‘वाहन 4.0’ पोर्टल की क्षमताओं का विस्तार कर ‘ऑटो-जनरेटेड क्लीयरेंस’ की व्यवस्था शुरू की जाए।
अभी क्या है स्थिति? महीनों का इंतजार और दफ्तरों के चक्कर
वर्तमान व्यवस्था में यदि कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी का राज्य बदलना चाहता है, तो उसे एक ऐसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जिसे ‘कानूनी भूलभुलैया’ कहना गलत नहीं होगा। वाहन मालिकों को आमतौर पर इन तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
लंबा इंतजार : पुराने RTO से रिकॉर्ड निकलवाने और फिजिकल NOC हासिल करने में ही अक्सर 2 से 3 महीने का समय निकल जाता है।
• भ्रष्टाचार का केंद्र : कागजी कार्रवाई इतनी जटिल बनाई गई है कि लोग मजबूरन दलालों का सहारा लेते हैं। एक साधारण NOC के लिए 5 से 10 हजार रुपये तक की अवैध वसूली एक अघोषित नियम बन चुकी है।
• फिजिकल वेरिफिकेशन का बोझ : गाड़ी चोरी की है या उस पर कोई आपराधिक मामला तो नहीं, यह चेक करने के लिए फिजिकल फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग तक हफ्तों घूमती रहती हैं।
जब अदालतों तक पहुंचे NOC के विवाद
वाहन एनओसी का इतिहास विवादों और कानूनी लड़ाइयों से भरा रहा है। इन केस स्टडीज ने ही आज नीति आयोग को इस बड़े बदलाव के लिए प्रेरित किया है:
1. दिल्ली का ‘लाइफ-बैन’ संकट : जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने दिल्ली-NCR में पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगाया, तो लाखों लोग अपनी गाड़ियां दूसरे राज्यों में ले जाने के लिए मजबूर हुए। उस समय दिल्ली के RTO कार्यालयों में सिस्टम ओवरलोड होने के कारण हजारों गाड़ियां बिना NOC के कबाड़ में बदल गईं।
2. टैक्स रिफंड की पेचीदगी : अक्सर देखा गया कि जब कोई व्यक्ति दूसरे राज्य में ट्रांसफर होता है, तो उसे वहां फिर से रोड टैक्स भरना पड़ता है। पुराने राज्य से टैक्स रिफंड पाने के लिए विभाग ‘NOC की फिजिकल कॉपी’ के नाम पर प्रक्रिया को 2-2 साल तक लटकाए रखते हैं।
3. सुरक्षा में चू क: मैनुअल सिस्टम होने के कारण दलाल अक्सर फर्जी NOC तैयार कर चोरी के वाहनों को दूसरे राज्यों में रजिस्टर करा देते हैं। डिजिटल सिस्टम आने से यह जोखिम पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
‘आखिर क्या और कैसे बदलेगा ?
नीति आयोग ने सिफारिश की है कि ‘वाहन 4.0’ पोर्टल और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के डेटा को पूरी तरह इंटीग्रेट किया जाए। इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो जाएगी:
• ऑटो-वेरिफिकेशन : जैसे ही आप ऑनलाइन आवेदन करेंगे, सिस्टम खुद चेक कर लेगा कि गाड़ी पर कोई पेंडिंग चालान या टैक्स तो नहीं है।
• रियल-टाइम डेटा : गाड़ी के आपराधिक रिकॉर्ड का मिलान ऑनलाइन डेटा से तुरंत हो जाएगा, जिससे मानवीय हस्तक्षेप की जरूरत नहीं रहेगी।
• त्वरित समाधान : मानवीय हस्तक्षेप खत्म होने से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और जो प्रक्रिया महीनों चलती थी, वह कुछ ही दिनों में पूरी हो सकेगी।
विशेषज्ञों का नजरिया: 1980 के नियमों में 2026 का बदलाव
परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि 1980 के दशक के पुराने नियमों को 2026 की आधुनिक तकनीक के साथ बदलना समय की मांग है। यह बदलाव न केवल ‘ईज ऑफ लिविंग’ (Ease of Living) को बढ़ावा देगा, बल्कि राज्यों के परिवहन विभागों पर से प्रशासनिक काम का बोझ भी कम करेगा। यदि यह नियम लागू होता है, तो यह ‘वन नेशन-वन हेल्प’ की दिशा में सड़क परिवहन मंत्रालय के प्रयासों को और मजबूती प्रदान करेगा। हालांकि, वर्तमान में फिजिकल NOC की प्रक्रिया लागू है। नीति आयोग के इस सुझाव पर केंद्र की अंतिम मुहर के बाद ही यह नया सिस्टम जमीनी स्तर पर काम करना शुरू करेगा।

