
नई दिल्ली : सरकारी आंकड़ों से पता चला है कि देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं। इनमें सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और प्राइवेट सभी स्कूल शामिल हैं। अकेले आंध्र प्रदेश में ऐसे 16,000 से ज्यादा स्कूल हैं। यह आंकड़े टीचरों की तैनाती में भारी कमी को दिखाते हैं, जबकि देश का कुल स्टूडेंट-टीचर अनुपात राष्ट्रीय मानकों के दायरे में है। शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि स्टूडेंट-टीचर अनुपात प्राइमरी लेवल पर 19, अपर प्राइमरी पर 17, सेकेंडरी पर 15 और हायर सेकेंडरी पर 23 है। ये सभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तय सीमा के भीतर हैं। हालांकि, एक-टीचर वाले स्कूलों के आंकड़े बताते हैं कि अच्छे राष्ट्रीय औसत के पीछे टीचरों की उपलब्धता में स्थानीय स्तर पर भारी असंतुलन छिपा हुआ है।
यह समस्या सिर्फ गरीब या भौगोलिक रूप से मुश्किल इलाकों वाले राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई है। तेलंगाना में ऐसे 4,793 स्कूल हैं, तमिलनाडु में 3,957 और असम में 3,159। हिमाचल प्रदेश में 3,128, उत्तराखंड में 2,655 और छत्तीसगढ़ में 2,461 स्कूल हैं। दूसरी तरफ, केरल में 67, नागालैंड में 35, सिक्किम में 31, लद्दाख में 28, दिल्ली में सात और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में एक सिंगल-टीचर स्कूल की जानकारी मिली है।
ये आंकड़े शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने राज्यसभा में शिक्षकों की खाली जगहों के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में दिए। हालांकि सवाल में खास तौर पर सरकारी स्कूलों के आंकड़े मांगे गए थे लेकिन सिंगल-टीचर स्कूलों की लिस्ट में सभी तरह के मैनेजमेंट वाले स्कूल शामिल हैं। मंत्रालय ने राज्य-वार मंजूर पदों या खाली जगहों की जानकारी नहीं दी। मंत्रालय का कहना था कि शिक्षकों की भर्ती, सर्विस की शर्तें और तैनाती का काम राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन देखता है। इसमें खाली पदों की वजह रिटायरमेंट, इस्तीफा, नए पद बनाना, स्टाफ को सही तरीके से व्यवस्थित करना और एनरोलमेंट में बदलाव (जिसमें ग्रामीण, आदिवासी और आकांक्षी जिले भी शामिल हैं) को बताया गया। केंद्र ने कहा कि राज्यों को लगातार सलाह दी जाती रही है कि वे पारदर्शी और मेरिट-आधारित भर्ती प्रक्रिया से पद भरें और शिक्षकों की जरूरत का अनुमान लगाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें।

