
पटना : राजकीय संस्कृत महाविद्यालय पटना के हिंदी विभाग के तत्वावधान में ‘ मानव जीवन में साहित्य की प्रयोजनीयता ‘ पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन बुधवार को हुआ। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा जंग बहादुर पांडेय ने कहा कि साहित्य दो शब्दों के योग से बना है-स और हित। स का अर्थ साथ और हित का अर्थ कल्याण और भलाई है।अर्थात् ज्ञान की वह शाखा जिसमें एकता और नेकता का भाव हो साहित्य है। संस्कृत में कहा गया है कि हितेन स:इति साहित्यम्। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि-ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा है कि किसी जाति के पूर्वजों का चिर संचित ज्ञान वैभव ही साहित्य है।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कल्पलता में लिखा है कि-सारे मानव समाज को सुंदर बनाने की साधना का नाम साहित्य है।ज्ञान की सभी शाखाओं की अपनी अपनी प्रयोजनीयता है, लेकिन ज्ञान की सभी शाखाओं में साहित्य की प्रयोजनीयता सर्वोपरि है। डा पांडेय ने कहा कि संक्षेप में साहित्य की प्रयोजनीयता है- साहित्य हमें एकता और नेकता का बोध कराता है। साहित्य विघटन नहीं, संघटन का संदेश देता है। उतरादायित्व का बोध कराता है। साहित्य जानकारी के साथ समझदारी की भावना प्रदान करता है। साहित्य हमें एकता और नेकता का बोध कराता है। साहित्य की अन्यतम् विशेषता मानव मन को संवारना और सुधारना है। साहित्य नालायक को लायक बनाता है। कुमति को दूर कर सुमति प्रदान करता है।
उन्होंने मानस की चौपाइयों को उद्धृत करते हुए कहा कि सुंदर कांड में लंकापति रावण को समझाते हुए विभीषण ने कहा है कि:-
सुमति कुमति सबके उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं।
जहाँ सुमति तहं संपति नाना।
जहाँ कुमति तंह विफति निदाना।
तव उर कुमति बसी विपरीता।
हित अनहित मानहुं रिपु प्रीता।
साहित्य फीको को नीको बनाता है:-
फीकी पै नीकी लगै कहिए समय विचारि।
सबका मन हर्षित करे, ज्यो विवाह में गारि।
बुरौ तौ लागत भलो, भले ठौर पर लीन।
तिय नैननि नीको लगै, काजल यद्यपि मलीन।
साहित्य परहित की भावना का विकास करता है:-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अघमाई।
या
परहित बस जिनके मन माहीं।
जग दुर्लभ तिनके कछु नाही।
मानव मन को उर्ध्वगामी बनाता है।
नेकी करना सिखाता है। ग्वाल कवि ने ठीक कहा है कि:-
दिया है खुदा ने खूब खुशी करो ग्वाल कवि,
खाव पियो, देव लेव यहीं रह जाना है।
राजा राव उमराव केते बादशाह भये,
कहाँ ते कहाँ को गयो लाग्यो ना ठिकाना है।
ऐसी जिंदगानी के भरोसे पै गुमान ऐसो,
देश देश घूमि घूमि मन बहलाना है।
आये परवाना पै चले ना बहाना इहां,
नेकी करि जाना फिर आना है न जाना है।
वसुधैव कुटुंबक्म् की भावना का विकास साहित्य की अन्यतम् विशेषता है।
साहित्य की अन्यतम् विशेषता मानव मन को संवारना एवं सुधारना है।
राष्ट्र कवि दिनकर ने रश्मि रथी में ठीक ही लिखा है कि-
झड़ गई पूंछ रोमांत झडे़,
पशुता का झड़ना बाकी है।
बाहर बाहर तन संवर चुका,
मन अभी संवरना बाकी है।
मानव जीवन के तीन धरातल हैं-तन का, धन का और मन का। इनमें मन ही सर्वोपरि है। मन के सवंरते ही तन और धन सवंर जाते हैं, इसीलिए संत कबीर ने ठीक कहा है कि
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
कह कबीर हरि पाइहैं, मन ही की परतीत।

कार्यक्रम में सारस्वत वक्ता के रूप में बोलते हुए रमेश्वर लता संस्कृत कालेज, दरभंगा के हिंदी विभाग के प्रो डॉ सुनील कुमार ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण है और यह मन का संस्कार करता है। वहीं, विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए राजकीय संस्कृत महाविद्यालय पटना के पूर्व हिंदी प्राध्यापक डा श्याम सुन्दर पांडेय ने कहा कि साहित्य हमारा संस्कार करता है और साहित्य की अंतिम प्रयोजनीयता मानव जीवन में आचार, विचार और संस्कार को पैदा करना है। साहित्य मानवता की रक्षा करता है और समाज में शांति एवं सद्भावना स्थापित करता है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कॉलेज के विद्वान् प्राचार्य डा मनोज कुमार ने कहा कि साहित्य मानवता का रक्षक और सुविचारों का प्रतिष्ठापक है। मेरा विश्वास है कि डॉ पाण्डेय के सारगर्भित उद्बोधन से हमारे शिक्षक और विद्यार्थी लाभान्वित हुए हैं और उनका मन यत्किंचित् सुधरा होगा।व्यस्तता के कारण कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय के कुलपति संगोष्ठी में समुपस्थित नहीं हो सके, लेकिन उनके संदेश को प्राचार्य डा मनोज कुमार ने सुनाया। कुलपति ने संगोष्ठी की सफलता की कामना करते हुए कहा था कि मानव जीवन में साहित्य की प्रयोजनीयता मानवता एवं देवत्व की प्रतिष्ठा है। संगोष्ठी में कालेज के सभी शिक्षक शिक्षिका वृंद उपस्थित रहे। डॉ ज्योत्स्ना मिश्रा, डॉ शिवानंद शुक्ल,डॉ अलका कुमारी, डॉ विवेकानंद पासवान, डॉ शबाना शिरीन, बृज कुमार भगत (आरा) निपुण आलमबायन (दिल्ली), प्रेम वर्मा, प्रवीण शेखर तथा अमीर नाथ शर्मा की गरिमामयी उपस्थिति आद्योपांत बनी रही।दिल्ली से आये शिक्षाविद् और संविधान विशेषज्ञ डा निपुण आलमबायन ने अपने उद्बोधन से संगोष्ठी में चार चांद लगाया।अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें डा राजेंद्र प्रसाद (आरा] ने कविता सुनाई-
इक सवारी आएगी, इक सवारी जायेगी।
बारी-बारी, सबकी बारी आयेगी।
वहीं, डॉ मीना परिहार मान्या ने अपनी गजल सुनाकर दर्शकों का मन मोह लिया-
बिन तेरे अधूरी रही ये जिंदगी।
इस तरफ बेबसी, उस तरफ बेक्सी।
गांव की जिंदगी, जिंदगी है बहुत।
हर तरफ दोस्ती है, नहीं दुश्मनी।
डॉ मनोज गोवर्द्धन पुरी (पटना)ने अपनी भक्ति परक रचना से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया
चलो प्रभु के द्वार, बंधु चलो प्रभु के द्वार।
भक्ति जगाकर शक्ति बढाकर,
दानवता सब दूर भगाकर,
सबके हृदय में प्रेम जगाकर,
बने हम सबका यार।
हे बंधु!चलो प्रभु के द्वार।
प्रभु कृपा हम सब पर बरसे,
सर्व सुख संग मन अब हरषे।
परोपकार के भाव सभी में,
पनपे बारम्बार, हे बंधु चलो प्रभु के द्वार।
एवं डा मिंटू शर्मा (मुजफ्फरपुर) ने शब्दों की महिमा पर कविता सुनाकर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया
शब्द से ही रामायण हुआ,
शब्द से ही महाभारत हुआ।
शब्द से ही आरंभ है,
शब्द से ही अंत है।
सभी कवि कवयित्रियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं का मन मोह लिया। डॉ मीना परिहार ने अपनी दमदार गजल सुनाकर श्रोताओं के दिलों को जीत लिया। डा जेबी पांडेय ने प्राचार्य डॉ मनोज कुमार, डॉ उमेश शर्मा, डॉ ज्योत्स्ना मिश्रा, डॉ अलका कुमारी, डॉ मीना परिहार, डॉ मिंटू शर्मा, डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ मनोज गोवर्द्धन पुरी को हिंदी रत्न सम्मान तथा कर्मवीर सम्मान से सम्मानित किया, जिसका श्रोताओं ने करतल ध्वनि से अनुमोदन किया। आगत अतिथियों का भव्य स्वागत व्याकरणाचार्य डॉ उमेश शर्मा ने, मंगलाचरण ऋतिक भारद्वाज एवं अभिषेक कुमार झा ने,सरस्वती वंदना एवं कालेज का कुलगीत छात्र-छात्राओं ने, फोटो ग्राफी डा ज्योत्स्ना मिश्रा ने कुशल संचालन हिंदी की प्राध्यापिका डॉ अलका कुमारी एवं डॉ शिवानंद शुक्ल ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ विवेकानंद पासवान ने किया। राष्ट्र गान और शांति पाठ से संगोष्ठी की पूर्णाहुति हुई।
