
पूर्व आइएएस अधिकारी, चर्चित उपन्यासकार, कथाकार और कवि रणेंद्र झारखंड समेत राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ग्लोबल गांव के देवता के लेखक के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि हासिल की है। फार्मेट चाहे कहानियों का हो या उपन्यास या फिर कविता का, सबमें उन्हें महारत हासिल है। उनसे उनके बरियातू स्थित आवास पर न्यूज अरोमा के स्थानीय संपादक दयानंद राय ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत का संपादित अंश।

सवाल : आपका एक काबिले-गौर कथन है कि आप बड़ा आदमी उसे मानते हैं जिसके पास बड़ी लाइब्रेरी हो। आपके इस कथन का वैचारिक आधार क्या है?
जवाब : आपका कहना बिल्कुल सही है। मेरी नजर में बड़ा आदमी वही है जिसकी लाइब्रेरी बड़ी हो, जिसकी सोच बड़ी हो और कर्म भी उत्कृष्ट हों। मेरे इस कथन का उत्स आठवीं से 12वीं सदी के अरब साम्राज्य से ताल्लुक रखता है। वहां एक अब्बासी खलीफा हुआ करता था, उनका भी यही मत था कि बड़ा आदमी वही है जिसकी लाइब्रेरी बड़ी हो। उनका कार्यकाल विज्ञान और ज्ञान के क्षेत्र में स्वर्णिम काल माना जाता है। उनके समय में अनुवाद का आंदोलन चलाया गया और राज्य संपोषित प्रयोगशालाएं खुलीं बाद में यही ज्ञान-विज्ञान का प्रसार यूरोप में पुनर्जागरण का कारण बना। अपने अध्ययन से मैंने पाया कि पुस्तकें आपको समृद्ध बनाती हैं, ज्ञान आपको विवेकशील बनाता है और लाइब्रेरी में पढ़ी गयी किताबों से आपमें बहुलवादी और क्रिटिकल सोच का विकास होता है। किताबें आपकी सोच को परिष्कृत करती हैं, आपमें स्थित बेहतर मनुष्य को जगाती हैं, इसलिए मैं मानता हूं कि बड़ा आदमी वही है जिसकी लाइब्रेरी बड़ी हो।
सवाल : मैंने सुना है कि आपने अपने जीवन के लगभग एक दशक किताबों को निहारते गुजारा है?
जवाब : आपने ठीक सुना है। गांव में पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं 1980 से मैं पटना में एक हॉस्टल में रहकर पढ़ता था। उस समय मेरे पिता मेरे खर्चे के लिए 150 रुपये मासिक भेजा करते थे, उसी में रहना-खाना और हॉस्टल का किराया देना होता था। उस समय पटना में राजकमल प्रकाशन का आउटलेट था जहां किताबें शीशे की सेल्फ में सड़क की ओर मुंह करके दृश्यमान रहती थीं और मैं उन्हें निहारता रहता था। पढ़ने की ललक और लत मुझे बचपन से ही लग गयी थी पर उस समय इतने पैसे ही नहीं होते थे कि किताबें खरीद सकूं। उस समय एक किताब की कीमत 20 रुपये होगी और उतने पैसे मेरे पास खर्चे काटकर बचते नहीं थे तो 1980 से आठ नौ साल तक या यूं कहिए कि लगभग एक दशक का सफर मैंने किताबों को हसरत से निहारते गुजारा है। आज मेरी पर्सनल लाइब्रेरी में 5000 से अधिक किताबें मौजूद हैं। पुस्तकों से लगाव से जुड़ा एक और किस्सा ये है कि 1991 में जब मेरी शादी हुई थी तो उस समय मिले गोड़-लगायी के पैसों से भी मैंने किताबें ही खरीदी थी।
सवाल : मैंने सुना है कि आपके पास इतनी किताबें हैं कि उन्हें स्थान देने के लिए आपने अलग से एक फ्लैट खरीद लिया। इसमें कितनी सच्चाई है?
जवाब : आपने जो सुना है उसमें सच्चाई है। दरअसल, मैं मोरहाबादी के जिस फ्लैट जिसे मैंने घरौंदा नाम दे रखा है में रहता हूं, उसमें किताबों के रहने की जगह लगातार कम पड़ती जा रही थी। अपने प्रशासनिक सेवा के कार्यकाल में लगातार किताबें मेरे पास बढ़ती जा रही थीं, एक समय आया कि एक फ्लैट में उनका निवास करना मुश्किल हो गया तो फिर मैंने एक दूसरा फ्लैट खरीद लिया। ताकि उनके रहने की व्यवस्था की जा सके। मैंने अपनी लाइब्रेरी में रखी गयीं किताबों को गिना तो नहीं है पर एक अनुमान के मुताबिक मेरे पास करीब 5000 किताबें तो होंगी ही।
सवाल : आप देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और गोष्ठियों में व्याख्यान देने के लिए जाते हैं। उसके लिए आप क्या तैयारी करते हैं?
जवाब : व्याख्यान देना मैं बहुत जिम्मेवारी का काम समझता हूं, क्योंकि आप प्रबुद्ध लोगों के बीच अपने विचारों को रखते हैं। तो विषय से संबंधित तैयारी में मैं बहुत वक्त लगाता हूं, कई बार मैंने देखा और सुना है कि बहुत सीनियर लोग भी बिना तैयारी के बोलते हैं। वे समझते हैं कि लोग उनके आभामंडल से ही प्रभावित हो जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं है। मैं कोई टीका-टिप्पणी नहीं कर रहा लेकिन मुझे लगता है कि बिना तैयारी के बोलना उचित नहीं है।
सवाल : जब आप राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रोन्नत हुए तो क्या फर्क आपने महसूस किया?
जवाब : आइएएस अधिकारी के रूप में प्रोन्नति मिलने को मैं अपने जीवन के बेहतरीन अनुभवों में से एक में गिनता हूं। आइएएस बनकर आपके मन में एक अलग तरह का भाव जगता है, एक किस्म का गौरव बोध होता है। इसका चार्म, पावर और ग्लैमर अलग तरह का है। पीसीएस में वो बात नहीं है।
कौन हैं रणेंद्र

रणेन्द्र का जन्म 4 मार्च 1960 को बिहार के नालन्दा जिले के सोहसराय में हुआ।
प्रशासनिक सेवा से सम्बद्ध रहे रणेन्द्र की प्रकाशित कृतियां है : ग्लोबल गांव के देवता, गायब होता देश, गूंगी रूलाई का कोरस (उपन्यास), रात बाकी एवं अन्य कहानियां, छप्पन छुरी बहत्तर पेंच (कहानी-संग्रह) और थोड़ा-सा स्त्री होना चाहता हूं (कविता संग्रह)। इन्होंने ‘झारखण्ड एन्साइक्लोपीडिया’ और ‘पंचायती राज : हाशिये से हुकूमत तक’ का सम्पादन भी किया है।
इनकी अनेक रचनाएं कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। ‘ग्लोबल गांव के देवता’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘लॉड् र्स ऑफ ग्लोबल विलेज’ नाम से प्रकाशित हो चुका है।
इन्हें 11 लाख रुपये का श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान, प्रथम विमलादेवी स्मृति सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, जे.सी. जोशी स्मृति जनप्रिय लेखक सम्मान कई और अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।
पिता रहे चुके हैं हिन्दी के विभागाध्यक्ष
रणेंद्र के पिता डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद नालंदा के कस्बा सोसराय के किसान कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। उनके घर पर साहित्य सम्मेलन संस्था की पाक्षिक गोष्ठी हुआ करती थी। वहीं से उनमें साहित्यिक अभिरुचि जागृत हुई। उन्होंने गोष्ठी में ही पहली कविता लिखकर सुनाई थी। उस कविता की बड़ों ने हौसला-अफजाई की और यह क्रम चल पड़ा। सोसराय के अलावा घर की लाइब्रेरी की लगभग सभी किताबें पढ़ डालीं। कॉलेज पहुंचते ही पिता से वैचारिक मतभेद होने लगे, पर उन्होंने कभी रोका-टोका नहीं।
‘गायब होता देश’ 10 सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शामिल
भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ ने जुलाई 2014 में लेखक-पाठक सर्वेक्षण की सूची प्रकाशित की थी, जिसमें रणेंद्र की रचना ‘गायब होता देश’ को 10 सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शामिल किया गया था। वह उपन्यास मुंडा आदिवासी जीवन का चित्रण करता है। जबकि उनका पहला उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता के केंद्र में आदिम जनजाति असुर की जिंदगी है।
