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देश की खनिज संपदा से जुड़ी 85 याचिकाओं पर सुनवाई शुरू, सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की..

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में ख‎निज संपदा से जुड़ी 85 या‎चिकाओं पर सुनवाई शुरु हो गई है। इससे राज्यों को अरबों का टैक्स जुटाने के मसले को हल करने में मदद ‎मिलेगी।

Hearing on Petitions of Mineral Wealth: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में ख‎निज संपदा से जुड़ी 85 या‎चिकाओं पर सुनवाई शुरु हो गई है। इससे राज्यों को अरबों का टैक्स जुटाने के मसले को हल करने में मदद ‎मिलेगी।

दरअसल राज्य द्वारा अपनी खनिज संपदा (Mineral Wealth) से समृद्ध भूमि पर संबंधित कानून से इतर भी टैक्स लगा सकती है, इस सवाल को 25 साल से लगातार पूछा जा रहा है, ‎जिसका जवाब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में वर्णित संघवाद के आईने में परखने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली Supreme Court की नौ जजों की पीठ ने संघवाद से जुड़ी कुल 85 लंबित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है। सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय का आने वाला आदेश झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के खनिज संपन्न राज्यों के टैक्स रेवेन्यू पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

पीठ जिन 85 याचिकाओं की समीक्षा कर रही है उन सबमें एक ही प्रश्न उठाया गया है- क्या राज्यों के पास खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम के प्रावधानों की परवाह किए बिना खनिज संपदा से परिपूर्ण भूमि पर टैक्स लगाने का अधिकार है।

इस प्रश्न का जवाब ढूंढने नौ न्यायाधीशों की पीठ द्वारा विचार किया जा रहा है। क्यों‎कि इसका केंद्रीय मुद्दा यह है कि क्या कोई राज्य विधानमंडल संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2, प्रविष्टि 49 के तहत जमीन के उत्पादन के मूल्य के आधार पर भूमि पर टैक्स लगा सकता है? अगर हां तो क्या जमीन पर टैक्स लगाया जाता है तो संवैधानिक स्थिति अलग होगी या नहीं।

अब Supreme Court को तय करना होगा कि इस परिस्थिति में संविधान की सातवीं अनुसूचि की सूची 2, प्रविष्टि 50 के अनुसार खनन भूमि, और सूची 1, प्रविष्टि 54 के साथ इसका संबंध क्या होगा। खनिज संपन्न राज्यों के लिए इस मुद्दे का महत्व इस तथ्य से स्पष्ट है कि अकेले झारखंड ने 1993 से 2023 के बीच खनिज वाली भूमि से 10,558 करोड़ रुपये टैक्स की उगाही की।

बता दें ‎कि यदि सुप्रीम कोर्ट राज्यों के खिलाफ फैसला सुनाता है तो झारखंड को Tax Revenue में सालाना लगभग 350 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। झारखंड और ओडिशा का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने खनिज वाली भूमि पर टैक्स लगाने के राज्यों के अधिकार के समर्थन में शुरुआती दलीलें दीं।

उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि Royalty खनिज अधिकारों के अनुदान के बदले में ली जाती है, इसलिए टैक्स संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2, प्रविष्टि 50 के दायरे में आता है। इस मामले पर लगातार बहस जारी है।

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