पश्चिम बंगाल सरकार ने 100 साल से बसे आदिवासी मजदूरों को किया अतिक्रमणकारी घोषित, खेतों और पेड़ों पर चलाया बुलडोजर

डूआर्स के तोरसा चाय बागान में 100 साल से बसे आदिवासी मजदूरों को अतिक्रमणकारी घोषित करने और जमीन खाली कराने के खिलाफ विस्थापन व भूमि अधिकार का संघर्ष जारी है।

News Aroma
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पश्चिम बंगाल : पश्चिम बंगाल के डूआर्स में भूटान बॉर्डर से संटे तोरसा चाय बागान क्षेत्र में केंद्र सरकार की ओर से जयगांव लैंड पोर्ट परियोजना प्रस्तावित है। इस परियोजना के लिए केंद्र सरकार की लैंड पोर्ट अथॉरिटी ने 122 एकड़ जमीन चिन्हित की है और शुरुआत के लिए 30 एकड़ जमीन मांगी। इसके बाद राज्य सरकार ने चाय बागान को दी गयी जमीन को वापिस लिया और केंद्र को दे दिया और बागान में 100 सालों से भी ज्यादा समय से बसे आदिवासी मजदूरों को अवैध अतिक्रमणकारी घोषित कर दिया। जमीन को खाली करने का फरमान जारी कर दिया। और एक दिन उनके खेतों, पेड़ों के बागान एवं पूर्वजों के कब्र पर जबरन जेसीबी चला दिया।
इसके विरुद्ध वहां के आदिवासी और गुरखा मजदूर, स्थानीय संगठन पश्चिम बंग चा मजूर समिति, के साथ मिलकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इस विस्थापन के मामले का हाल में तथ्यान्वेषण किया गया था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मुद्दा बड़ा स्पष्ट है। सवाल भूमि अधिकार का है। इस चाय बागान (और इस इलाके के दूसरे बागानों) में काम करने वाले ज़्यादातर आदिवासी मज़दूरों के पूर्वजों को आज़ादी से पहले झारखंड के उनके गांवों से यहां काम करने के लिए लाया गया था। उनके पास अपने पुश्तैनी गाँवों में ज़मीन थी। चाय बागानों में उन्हें खेती के लिए बागान के आस-पास की ज़मीन साफ़ करने की इजाज़त दी गई थी। हालांकि वे सौ से ज़्यादा सालों से इन ज़मीनों पर रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं, फिर भी उनके पास मालिकाना हक़ का कोई दस्तावेज़ नहीं है। जिस ज़मीन पर उन्हें घर दिए गए थे या जहाँ उन्होंने मज़दूरों की बस्तियों में घर बनाए थे, उस ज़मीन के लिए भी उनके पास मालिकाना हक़ का कोई दस्तावेज़ नहीं है। राज्य सरकार का कहना है कि यह ज़मीन सरकारी है, जो चाय बागानों को लीज़ पर दी गई है, और मज़दूरों का इस पर कोई अधिकार नहीं है। सरकार ने अब उन प्रभावित परिवारों से सलाह किए बिना ही यह ज़मीन एलपीएआई को दे दी है, जिनकी खेती की ज़मीन छिन जाएगी। इस प्रोजेक्ट की वजह से इन परिवारों को दूसरी बार विस्थापन का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा सदियों से चाय बागान के मजदूरों के शोषण की कहानी तो है ही। इस रिपोर्ट की फैक्ट फाइंडिंग टीम में वर्जिनियस खाखा, अनुप्रधा सिंह और सिराज दत्ता थे। तथ्यान्वेषण में पश्चिम बंग चा मजूर समिति के साथी तमाली बेरा, विनोद केरकेट्टा और किरसेन खडिया ने सहयोग किया।

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