अंधेरे को चीरकर दुश्मन के घर में किया था प्रहार: जानें वीर चक्र विजेता स्क्वाड्रन लीडर घनश्याम सिंह थापा की अनकही कहानी

वीर चक्र विजेता स्क्वाड्रन लीडर घनश्याम सिंह थापा की बहादुरी की कहानी, जिन्होंने 1971 युद्ध में दुश्मन के मसरूर एयरबेस पर साहसिक हमला कर इतिहास रचा।

News Aroma
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चंडीगढ़ : जब भी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का जिक्र होता है, तो भारतीय वायु सेना के जांबाजों का नाम सुनहरे अक्षरों में लिया जाता है। 3 दिसंबर 1971 की उस खौफनाक रात को, जब पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध का बिगुल बजा ही था, भारतीय वायु सेना के नंबर 35 स्क्वाड्रन के लीड नेविगेटर स्क्वाड्रन लीडर घनश्याम सिंह थापा ने पाकिस्तान के मसरूर एयरबेस पर एक ऐसा अचूक और दुस्साहसिक हमला किया, जिसने दुश्मन की कमर तोड़ दी। थापा के इसी अदम्य साहस, असाधारण कौशल और भारी गोलाबारी के बीच बेहतरीन कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया गया था।

मसरूर एयरबेस पर वह ऐतिहासिक और दुस्साहसिक रात

3 दिसंबर 1971 को युद्ध की शुरुआत के साथ ही भारतीय बमवर्षक विमानों के एक फॉर्मेशन को दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर हमला करने का अहम जिम्मा सौंपा गया। स्क्वाड्रन लीडर थापा चार विमानों के इस फॉर्मेशन के मुख्य नेविगेटर थे। उस दौर में नेविगेशन आज की तरह उन्नत उपकरणों पर नहीं, बल्कि नेविगेटर के कौशल, सटीक चार्ट रीडिंग और सहज प्रवृत्ति पर निर्भर करता था। हवा में हुई एक छोटी सी भी गणना की चूक का मतलब तबाही हो सकता था।

लक्ष्य था पाकिस्तान का मसरूर एयरबेस, जो भारी किलेबंदी और एंटी-एयरक्राफ्ट गन से सुरक्षित था और जवाबी हमले के लिए तैयार बैठा था। आसमान में दुश्मन की गोलियों की बौछार के बीच भी थापा का ध्यान तनिक भी नहीं भटका। उन्होंने विमानों को बिल्कुल सटीक रास्ते पर बनाए रखा और लक्ष्य पर पहुंचते ही अपने फॉर्मेशन को सिग्नल दिया— “ऑन टारगेट।” इसके बाद आसमान से गिरे बमों ने मसरूर एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचाया और उस मोर्चे पर युद्ध का पहला व निर्णायक प्रहार सफलता से पूरा किया।

13 जनवरी 1938 को हिमाचल प्रदेश के डलहौजी के पास बकलोह छावनी में जन्मे घनश्याम सिंह थापा एक सैन्य परिवार से ताल्लुक रखते थे। एक फौजी के बेटे होने के नाते अनुशासन और देशसेवा उनके जीवन का मूल आधार थे। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) से अपना कड़ा प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, 15 दिसंबर 1960 को उन्हें भारतीय वायु सेना में बतौर नेविगेटर कमीशन मिला। उनका शुरुआती सपना एक पायलट बनने का था, लेकिन नेविगेटर की भूमिका में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी वायु सेना के इतिहास में एक मिसाल है।

शानदार करियर, सादगी भरा जीवन और गोल्फ का शौक

युद्ध के मैदान से परे, उनका वायु सेना का करियर भी उत्कृष्ट रहा। उन्होंने अपनी सेवा के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। सिग्नल यूनिट्स की कमान संभालने से लेकर स्टेशन कमांडर और बाद में पश्चिमी वायु कमान (Western Air Command) के अहम पदों पर अपनी सेवाएं देते हुए उन्होंने एक बेहतरीन लीडर की छवि पेश की। 1992 में वे एयर कमोडोर के उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए और अपनी शानदार सेवा के एक अध्याय का समापन किया।

वर्दी उतारने के बाद उनका जीवन बेहद सादगी भरा रहा। 1968 में ललिता थापा से शादी के बाद उन्होंने एक खुशहाल पारिवारिक जीवन बिताया। उनकी बेटियां उन्हें एक ऐसे पिता के रूप में याद करती हैं जो हमेशा दूसरों को प्रेरित करते थे और लोगों से गहराई से जुड़े रहते थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपना समय गोल्फ के मैदान पर बिताना पसंद किया।

9 दिसंबर 2015 को इस महान योद्धा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। स्क्वाड्रन लीडर घनश्याम सिंह थापा की कहानी सिर्फ युद्ध की जीत की कहानी नहीं है; यह साहस, सटीकता और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का जीवंत प्रमाण है। यह साबित करती है कि इतिहास हमेशा दिन के उजाले में नहीं लिखा जाता, बल्कि इसे अंधेरे में उन लोगों द्वारा गढ़ा जाता है, जो आगे बढ़कर नेतृत्व करने का साहस रखते हैं।

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