

सूचना कानून का महत्व समझना हर किसी के वश की बात नहीं। इसने संविधान में संशोधन के बिना ही भारतीय संविधान और लोकतंत्र को विस्तार दिया। इससे पहले शासन प्रशासन को जवाबदेह बनाने वाला कोई कानून नहीं था। आरटीआई ने नागरिकों को सरकार से सवाल का अधिकार दिया। इसका अनुपालन सुनिश्चित वाला सूचना आयोग कोई फूलों की सेज नहीं, कांटों का बिस्तर है। बशर्ते कि सूचना आयुक्त कोई खुशामदी, भ्रष्ट या बेरीढ़ न हो। उसे सूचना अधिकार के व्यापक फलक की समझ हो। उसमें बड़ी संवैधानिक संस्थाओं तक के खिलाफ कलम चलाने की हैसियत हो। सूचना आयुक्त के पास नागरिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के उच्च मापदंडों की समझ हो।
यही सोचकर सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए विशेष मापदंड रखे गए। सांसदों, विधायकों, लाभ का पद धारण करने वालों, किसी राजनीतिक दल से संबंध रखने या कारोबार से जुड़े लोगों को इस पद के लिए उपयुक्त नहीं माना गया । दोबारा इस पद पर नियुक्ति तथा 65 साल की आयु के बाद नियुक्ति पर भी प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि यह आयुसीमा 60 साल करना बेहतर होगा। इन सबका मकसद सूचना आयोग को जीवंत और पारदर्शी संस्था बनाना था। ऐसी संस्था, जो सुप्रीम कोर्ट नहीं, तो उससे कम भी न हो।
दिलचस्प उदाहरण देखें। दिल्ली के सुभाष चंद्र अग्रवाल ने 2009 में सुप्रीम कोर्ट के जजों की द्वारा अपनी संपत्ति की घोषणा से संबधी सूचना सुप्रीम कोर्ट से मांगी। नहीं मिलने पर वह केंद्रीय सूचना आयोग गए। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील कर दी। यहां भी हारने के बाद दो सदस्य बेंच में सुनवाई हुई। यहां भी हार हुई। तब सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपनी अदालत में अपील की। दिलचस्प है कि यहां सुप्रीम कोर्ट की हार हुई। सूचना आयोग के आदेश का अनुपालन करने का निर्णय हुआ। इस प्रसंग सूचना आयोग का महत्व बताता है। सूचना आयोग ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय तक के खिलाफ अनगिनत फैसले दिए हैं।
ऐसे उच्च संस्थान पर किसी ऐरे-गैरे को बिठाना दुर्भाग्य होगा। सूचना आयोग में नेता अपने साले, भतीजे को न बिठा दें, इसके लिए अधिनियम में रोक लगाई गई। कुछ नेता इस पृथ्वी के सबसे निकृष्ट प्राणी होते हैं। पार्टी या बाप बदलने में देर नहीं लगती। पार्टी से इस्तीफा देने पर कोई गैर-राजनीतिक नहीं हो जाता। आयोग में जगह न मिले, तो भाईलोग फिर उसी पार्टी में नजर आएंगे।
दुर्भाग्य है कि देश में सूचना कानून को बर्बाद करने में सब लगे हैं। यह लोकतंत्र को विस्तार नहीं, विनाश की ओर ले जाने वाली बात है। झारखंड सरकार के पास एक बेहतर उदाहरण पेश करने का अवसर है।

