
चांद पर इंसानी बस्ती बसाने का सपना अब धीरे-धीरे हकीकत के करीब पहुंचता दिखाई दे रहा है। वैज्ञानिक लंबे समय से वहां पानी, ऊर्जा और ऑक्सीजन जैसे जरूरी संसाधनों की खोज में जुटे हैं। अब ऑक्सीजन उत्पादन को लेकर ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है, जिससे भविष्य में चांद पर रहने वाले लोगों को सांस लेने के लिए धरती पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
चांद की मिट्टी में छिपा है ऑक्सीजन का भंडार
वैज्ञानिकों का ध्यान चांद की सतह पर मौजूद रेगोलिथ यानी धूल और पत्थरों की परत पर है। शोध के मुताबिक इसमें करीब 40 से 45 प्रतिशत तक ऑक्सीजन मौजूद होती है। हालांकि यह ऑक्सीजन गैस के रूप में नहीं, बल्कि अन्य खनिजों के साथ रासायनिक रूप में जुड़ी रहती है। इसे अलग करना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिस पर अब बड़ी सफलता मिलती दिख रही है।
सोलर पाइरोलिसिस तकनीक से निकलेगी ऑक्सीजन
अमेरिका, चीन और यूरोप के वैज्ञानिक “सोलर पाइरोलिसिस” तकनीक पर काम कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में सूरज की किरणों को विशेष शीशों की मदद से एक जगह केंद्रित किया जाता है, जिससे हजारों डिग्री तापमान पैदा होता है। इतनी अधिक गर्मी में चांद जैसी मिट्टी पिघलने लगती है और उससे ऑक्सीजन अलग हो जाती है।
फ्रांस के वैज्ञानिकों ने दुनिया की सबसे बड़ी सोलर फर्नेस में इसका सफल परीक्षण किया। वैक्यूम चैंबर में रखी गई 3.38 ग्राम कृत्रिम चंद्र मिट्टी को लगभग 2000 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया गया, जिससे 35 मिलीग्राम ऑक्सीजन प्राप्त हुई।
भविष्य में चांद पर बस सकती है नई दुनिया
हालांकि अभी यह मात्रा बहुत कम है, लेकिन वैज्ञानिक इसे बड़ी शुरुआत मान रहे हैं। उनका कहना है कि यही तकनीक आगे चलकर चांद पर घर, उपकरण और निर्माण सामग्री तैयार करने में भी मदद कर सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती मशीनों को चांद की जहरीली धूल, तेज रेडिएशन और अत्यधिक तापमान में काम करने लायक बनाना है। इसके बावजूद वैज्ञानिकों को भरोसा है कि आने वाले वर्षों में इंसान चांद पर स्थायी जीवन की दिशा में बड़ा कदम उठाएगा।

