खराब कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए नई उम्मीद: जीन थेरपी से मिल सकता है लंबे समय तक फायदा

Manu Shrivastava
3 Min Read
जीन थेरपी
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दिल की बीमारी और बढ़े हुए खराब कोलेस्ट्रॉल यानी LDL से परेशान करोड़ों मरीजों के लिए नई उम्मीद सामने आई है। अमेरिकी दवा कंपनी एली लिली की नई जीन थेरपी दवा वर्व-102 के शुरुआती ट्रायल नतीजे काफी उत्साहजनक बताए जा रहे हैं। यह दवा केवल एक बार नस के जरिए दी जाती है और लंबे समय तक खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है।

कैसे काम करती है वर्व-102?

वर्व-102 जीन एडिटिंग तकनीक पर आधारित दवा है। यह शरीर में मौजूद PCSK9 नामक प्रोटीन को निशाना बनाती है। यह प्रोटीन लीवर में बनता है और शरीर से खराब कोलेस्ट्रॉल हटाने वाले रिसेप्टर्स को नुकसान पहुंचाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जिन लोगों में पीसीके9 प्राकृतिक रूप से कम सक्रिय होता है, उनमें हृदय रोग का खतरा काफी कम पाया गया है। वर्व-102 लीवर की कोशिकाओं में जाकर पीसीके9 जीन को “ऑफ” करने का प्रयास करती है, जिससे एलडीएल कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक कम रह सकता है।

शुरुआती ट्रायल में मिले सकारात्मक नतीजे

कंपनी द्वारा किए गए शुरुआती अध्ययन में 35 मरीजों को शामिल किया गया। ट्रायल के दौरान मरीजों में पीसीके9 स्तर में 51% से 88% तक कमी दर्ज की गई। वहीं खराब कोलेस्ट्रॉल एलडीएल -सी में 9% से 62% तक गिरावट देखी गई।

कुछ मरीजों में दवा का असर 18 महीने तक बना रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगे के ट्रायल भी सफल रहते हैं, तो यह थेरपी दिल की बीमारी के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकती है।

मौजूदा दवाओं से कैसे अलग है यह तकनीक?

फिलहाल बाजार में पीसीके9 को नियंत्रित करने वाली कई दवाएं मौजूद हैं, जैसे रेपाथा , प्रालुएंट और लेकवियो। लेकिन इन दवाओं को बार-बार लेना पड़ता है।

वर्व-102 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह “वन-टाइम जीन थेरपी” हो सकती है। यानी एक बार इलाज के बाद लंबे समय तक कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखा जा सकता है।

विशेषज्ञों ने क्या कहा?

रियाज़ एस पटेल, जो यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन  में कार्डियोलॉजिस्ट हैं, ने कहा कि कई मरीज लंबे समय तक अपना कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित नहीं रख पाते। इससे हार्ट अटैक और दूसरी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में यह नई जीन थेरपी भविष्य में महत्वपूर्ण विकल्प साबित हो सकती है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक की सुरक्षा और प्रभावशीलता को लेकर अभी बड़े स्तर पर और अध्ययन किए जाने बाकी हैं।

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