इंसानी न्यूरॉन्स से चलेंगे भविष्य के डेटा सेंटर? जानिए जैविक कंप्यूटिंग की नई दुनिया

Manu Shrivastava
3 Min Read
मानव न्यूरॉन्स
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भविष्य में डेटा सेंटर केवल सिलिकॉन चिप्स पर नहीं, बल्कि इंसानी दिमाग की कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स पर भी आधारित हो सकते हैं। सुनने में यह साइंस फिक्शन जैसा लगता है, लेकिन इस दिशा में रिसर्च तेज हो चुकी है। ऑस्ट्रेलिया की Cortical Labs ऐसी तकनीक विकसित कर रही है, जिसमें मानव न्यूरॉन्स को कंप्यूटर सिस्टम से जोड़कर जैविक डेटा सेंटर बनाए जाएंगे। इसका मकसद पारंपरिक कंप्यूटिंग को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि उसकी क्षमता को बढ़ाना है।

 

क्या है CL-1 सिस्टम?

 

कॉर्टिकल लैब्स का CL-1 सिस्टम एक हाइब्रिड डिवाइस है, जिसमें लगभग 2 लाख लैब में विकसित न्यूरॉन्स को सिलिकॉन चिप पर उगाया गया है। ये न्यूरॉन्स इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स के जरिए जानकारी को प्रोसेस करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इंसानी दिमाग सीखता और याद रखता है।

इन न्यूरॉन्स को सक्रिय और जीवित रखने के लिए विशेष लाइफ सपोर्ट सिस्टम तैयार किया गया है। इसमें पोषक तत्व, तापमान नियंत्रण और अन्य जैविक आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। कंपनी की योजना मेलबर्न के अलावा सिंगापुर में भी ऐसे जैविक डेटा सेंटर स्थापित करने की है।

 

एआई के बढ़ते इस्तेमाल से बढ़ी जरूरत

 

आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तेजी से विकसित हो रहा है। बड़े AI मॉडल को ट्रेन करने और चलाने के लिए विशाल डेटा सेंटर, अत्यधिक बिजली और पानी की आवश्यकता होती है। इससे ऊर्जा खपत और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ रही है।

इसके विपरीत, इंसानी मस्तिष्क केवल लगभग 20 वॉट ऊर्जा में जटिल निर्णय लेने, पैटर्न पहचानने और सीखने जैसे कार्य कर सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक न्यूरॉन आधारित कंप्यूटिंग को भविष्य की ऊर्जा-कुशल तकनीक मान रहे हैं।

 

क्या सिलिकॉन चिप्स की जगह ले पाएंगे जैविक सिस्टम?

 

फिलहाल जैविक डेटा सेंटर शुरुआती चरण में हैं। इंडस्ट्री मानकों के हिसाब से इनकी क्षमता अभी सीमित है। कॉर्टिकल लैब्स का CL-1 सिस्टम अभी बेंच-स्केल स्तर का डिवाइस है, जिसकी तैनाती सीमित यूनिट्स तक ही संभव है।

इसके मुकाबले अमेज़ॅन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल  जैसे टेक दिग्गजों के डेटा सेंटर हजारों सर्वर पर काम करते हैं। अभी तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है कि जैविक सिस्टम जीपीयू और सीपीयू  जितनी तेज एआई ट्रेनिंग या डेटा प्रोसेसिंग कर सकते हैं।

 

नैतिक और कानूनी चुनौतियां

 

मानव न्यूरॉन्स के उपयोग को लेकर नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं। हालांकि मौजूदा सिस्टम चेतना या इंसानी सोच से काफी दूर हैं, लेकिन तकनीक के विकास के साथ स्पष्ट नियम और दिशानिर्देश बनाना जरूरी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक कंप्यूटिंग के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए वैश्विक स्तर पर नियमन आवश्यक होगा।

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