लालू यादव कांस्टेबल बनना चाहते थे पर बन गए राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा

Archana Ekka
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पटना : भारत की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती। एक साधारण किसान परिवार का लड़का, जिसकी सबसे बड़ी इच्छा सरकारी नौकरी पाने की थी, आगे चलकर देश की राजनीति का ऐसा चेहरा बन गया, जिसके बिना गठबंधन सरकारों की कल्पना भी अधूरी मानी जाती थी। यह कहानी है लालू प्रसाद यादव की। 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में जन्मे लालू यादव आज भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में गिने जाते हैं। उनके समर्थक उन्हें सामाजिक न्याय का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें विवादों से घिरा नेता बताते हैं। लेकिन यह सच है कि दशकों तक उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा प्रभावित की।

फुलवरिया की गलियों से शुरू हुई कहानी

बिहार के एक साधारण यादव परिवार में जन्मे लालू प्रसाद यादव का बचपन आर्थिक संघर्षों के बीच बीता। परिवार बड़ा था और संसाधन सीमित थे। उस समय उनके सपने भी बेहद सामान्य थे। वे एक सरकारी नौकरी चाहते थे, ताकि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके। कहा जाता है कि युवावस्था में उनका झुकाव पुलिस विभाग की नौकरी की ओर था और वे कांस्टेबल बनने का सपना देखते थे। उन्हें शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि एक दिन मुख्यमंत्री निवास और संसद के गलियारों में उनकी गूंज सुनाई देगी।

 छात्र राजनीति ने बदल दी जिंदगी की दिशा

पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान लालू यादव की रुचि छात्र राजनीति की ओर बढ़ी। वर्ष 1970 में वे पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव बने। यह उनके सार्वजनिक जीवन की पहली बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद 1973 में वे छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। यहीं से उनकी नेतृत्व क्षमता सामने आने लगी। उस दौर में बिहार और देश की राजनीति उथल-पुथल से गुजर रही थी। युवा वर्ग परिवर्तन चाहता था और लालू उसी लहर का हिस्सा बन गए।

जेपी आंदोलन ने बना दिया राष्ट्रीय चेहरा

साल 1974 में जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार और सत्ता के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन ने देशभर के युवाओं को आकर्षित किया। लालू यादव भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। लेकिन यही संघर्ष उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बन गया। जेल से निकलने के बाद वे केवल छात्र नेता नहीं रहे, बल्कि उभरते हुए जननेता के रूप में देखे जाने लगे। यही वह मोड़ था जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

केवल 29 साल की उम्र में बने सांसद

1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने लालू यादव को उम्मीदवार बनाया। जनता पार्टी की लहर चली और लालू यादव जीतकर संसद पहुंच गए। उस समय उनकी उम्र केवल 29 वर्ष थी। वे उस दौर के सबसे युवा सांसदों में शामिल थे। संसद में पहुंचना किसी भी युवा नेता के लिए बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन लालू यादव के लिए यह केवल शुरुआत थी। आने वाले वर्षों में उन्होंने बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बना ली।

कैसे बने पिछड़ों और वंचितों की आवाज

1980 और 1990 के दशक में लालू यादव ने खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में स्थापित किया। उन्होंने पिछड़े वर्गों, दलितों और गरीब तबकों की आवाज उठाने का दावा किया। बिहार में यादव और मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा समर्थन उन्हें मिलने लगा। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे “एमवाई समीकरण” का नाम दिया। यही सामाजिक आधार आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। धीरे-धीरे वे बिहार की राजनीति के केंद्र में आ गए।

मुख्यमंत्री बनने के बाद बदल गया राजनीतिक परिदृश्य

मार्च 1990 में लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि बिहार की सामाजिक राजनीति में भी बड़ा बदलाव था। उन्होंने चरवाहा विद्यालयों की शुरुआत की, खेतिहर मजदूरों के न्यूनतम वेतन में वृद्धि की और कई ऐसे फैसले लिए जिन्हें गरीबों के हित में बताया गया। उनके समर्थकों का मानना था कि उन्होंने समाज के उन वर्गों को राजनीतिक सम्मान दिया, जो लंबे समय तक सत्ता से दूर रहे थे। इसी दौर में उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई।

वह फैसला जिसने देश की राजनीति हिला दी

1990 में राम मंदिर आंदोलन पूरे देश में चर्चा का विषय था। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी राम रथ यात्रा निकाल रहे थे। जब उनकी यात्रा बिहार पहुंची, तब मुख्यमंत्री लालू यादव ने समस्तीपुर में उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया। यह कदम राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल लेकर आया। भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया और राजनीतिक समीकरण बदल गए। इस घटना के बाद लालू यादव राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत और प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे।

विवादों का दौर और चारा घोटाले का झटका

राजनीति में सफलता के साथ विवाद भी बढ़ते गए। 1990 के दशक में चारा घोटाला सामने आया। इस मामले में लालू यादव पर सरकारी खजाने से अवैध निकासी के आरोप लगे। जांच आगे बढ़ी और 1997 में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर था। लेकिन यहां भी उन्होंने ऐसा कदम उठाया, जिसने सबको चौंका दिया। उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर सत्ता की कमान अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखी।

राष्ट्रीय जनता दल की स्थापना

जुलाई 1997 में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद का गठन किया। नई पार्टी बनने के बाद भी उनका जनाधार बना रहा। बिहार की राजनीति में राजद एक प्रमुख शक्ति बन गई। कई चुनावों में उतार-चढ़ाव आए, लेकिन लालू यादव का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ। यही कारण था कि उन्हें लंबे समय तक बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा खिलाड़ी माना जाता रहा।

जब रेलवे ने दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

2004 में केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार बनी और लालू यादव को रेल मंत्री बनाया गया। उस समय भारतीय रेलवे की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंताएं थीं। लेकिन उनके कार्यकाल में रेलवे की आय बढ़ी और प्रबंधन मॉडल की चर्चा देश-विदेश में होने लगी। उनके कामकाज पर कई प्रबंधन संस्थानों में अध्ययन हुए। यहां तक कि उन्हें भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद में छात्रों को संबोधित करने के लिए भी आमंत्रित किया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन की सबसे चर्चित उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।

एक नेता, जो भाषणों से बन गया जनप्रिय चेहरा

लालू यादव की लोकप्रियता केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। उनका बोलने का अंदाज, बिहारी लहजा और हास्यपूर्ण टिप्पणियां उन्हें अलग पहचान देती रहीं। उनके भाषणों के वीडियो अक्सर चर्चा में रहते थे। चाहे सड़कों की तुलना फिल्म अभिनेत्री के गालों से करने वाला बयान हो या रेलवे में कुल्हड़ को बढ़ावा देने की पहल, लालू हमेशा सुर्खियों में बने रहे। यही वजह है कि समर्थक और विरोधी दोनों उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सके।

परिवार और राजनीति का गहरा रिश्ता

लालू यादव का परिवार भी लगातार राजनीति में सक्रिय रहा है। उनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रहीं। उनके पुत्र तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव भी राजनीति में सक्रिय हैं। विशेष रूप से तेजस्वी यादव बिहार की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके हैं। इस तरह लालू यादव का राजनीतिक प्रभाव नई पीढ़ी तक पहुंचता दिखाई देता है।

आखिर क्यों कहा जाता है उन्हें ‘किंगमेकर’?

भारतीय राजनीति में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनीं, जब केंद्र में सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों का समर्थन जरूरी था। ऐसे समय में लालू यादव की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। वे कई गठबंधनों के निर्माण और संतुलन में अहम कड़ी बने। यही कारण है कि उन्हें अक्सर भारतीय राजनीति का ‘किंगमेकर’ कहा जाता है। उनकी राजनीतिक यात्रा बताती है कि साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी देश की सत्ता संरचना को प्रभावित कर सकता है।

कांस्टेबल बनने का सपना देखने वाला एक युवक, बिहार का मुख्यमंत्री बना, रेल मंत्री बना और राष्ट्रीय राजनीति का ऐसा चेहरा बना जिसने दशकों तक सुर्खियां बटोरीं। संघर्ष, सफलता, विवाद और वापसी से भरी लालू प्रसाद यादव की कहानी भारतीय लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प राजनीतिक यात्राओं में गिनी जाती है। आज भी उनका नाम आते ही राजनीति, जनसभाओं और सत्ता के समीकरणों की कई यादें ताजा हो जाती हैं। यही वजह है कि लालू यादव केवल एक नेता नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।