
पारंपरिक सिगरेट की तुलना में ई-सिगरेट (वेपिंग) को अक्सर कम नुकसानदेह माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में सामने आए शोध इस धारणा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि वेपिंग के दौरान शरीर में जाने वाला धुआं कई ऐसे रसायनों से भरा होता है, जो लंबे समय में गंभीर बीमारियों, विशेष रूप से कैंसर, का खतरा बढ़ा सकते हैं। हालांकि अभी यह प्रत्यक्ष रूप से साबित नहीं हुआ है कि ई-सिगरेट कैंसर का कारण बनती है, लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य चिंता बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं।
रिसर्च में क्या सामने आया?
2017 से 2025 के मध्य प्रकाशित सहकर्मी-समीक्षित (Peer-reviewed) शोधों के विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने वेपिंग के स्वास्थ्य प्रभावों का अध्ययन किया। इन अध्ययनों में पाया गया कि ई-सिगरेट से निकलने वाले धुएं में निकोटीन, उसके उप-उत्पाद और धातुओं के सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं। ये ऐसे रसायन हैं, जिनमें कई कैंसरकारी गुण पाए जाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन तत्वों का प्रभाव केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शरीर पर पड़ सकता है।
रक्त और मूत्र परीक्षणों ने बढ़ाई चिंता
अध्ययनों में किए गए रक्त और मूत्र परीक्षणों से यह पुष्टि हुई कि वेपिंग करने वाले लोगों के शरीर में ई-सिगरेट से जुड़े रसायन अवशोषित हो रहे हैं। ये वही रसायन हैं जिन्हें कैंसर से संबंधित माना जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि वेपिंग के दौरान शरीर सीधे ऐसे तत्वों के संपर्क में आता है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
डीएनए और कोशिकाओं में दिखे बदलाव
शोध में यह भी पाया गया कि वेपिंग करने वालों के मुंह और फेफड़ों की कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव दिखाई दिए। इसके अलावा, कैंसर से जुड़े बायोमार्कर में भी परिवर्तन दर्ज किए गए। बायोमार्कर ऐसे जैविक संकेत होते हैं, जो ट्यूमर बनने से पहले कोशिकाओं में होने वाले बदलावों की ओर इशारा करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ये निष्कर्ष भविष्य में कैंसर के संभावित खतरे का संकेत हो सकते हैं।
अभी निर्णायक निष्कर्ष नहीं, लेकिन खतरे के संकेत स्पष्ट
वैज्ञानिकों का कहना है कि धूम्रपान और फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध स्थापित होने में लगभग 100 वर्ष लगे थे। इसी तरह, वेपिंग के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने में भी कई दशक लग सकते हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ई-सिगरेट कितने लोगों में कैंसर का कारण बनेगी, लेकिन यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि वेपिंग पूरी तरह सुरक्षित है या इसका जोखिम बहुत कम है।
जागरूकता और शोध दोनों है जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वेपिंग करने वाले लोगों पर लंबे समय तक वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है, ताकि इसके वास्तविक स्वास्थ्य प्रभावों का स्पष्ट आकलन किया जा सके। साथ ही, लोगों को यह समझना भी जरूरी है कि ई-सिगरेट धूम्रपान का सुरक्षित विकल्प नहीं मानी जा सकती। समय रहते जागरूकता, वैज्ञानिक शोध और प्रभावी स्वास्थ्य नीतियां अपनाकर भविष्य में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है।

