
- सुशोभित
नसीरुद्दीन शाह भारत में जन्मे सम्भवत: महानतम अभिनेता हैं। एक इरफ़ान की ही उनसे तुलना की जा सकती है। अगर वे अमेरिका में जन्मे होते तो अभी तक कम से कम चार ऑस्कर पुरस्कार जीत चुके होते और डेनियल डे-लुइस के समकक्ष कहलाते। लेकिन विलक्षण प्रतिभाशाली होने के साथ ही वे हाईली-एजुकेटेड और एनलाइटंड भी हैं और सिनेमा में आने से पहले ही थिएटर की दुनिया का क़द्दावर नाम बन चुके थे।
उन्होंने शेक्सपीयरियन ड्रामा भी बहुत किया है और हिन्दी-उर्दू-अंग्रेज़ी तीनों का सटीक उच्चारण करने में सक्षम हैं। वास्तव में उनके अभिनय-कौशल का उनकी तीक्ष्ण-बुद्धिमत्ता से सीधा-नाता है, क्योंकि उन्होंने मैथड-एक्टिंग से अपने किरदारों को जिस तरह से अपने भीतर ‘इंटर्नलाइज़’ किया है, वह किसी मेधावी के ही बूते की बात है।
नसीर साहब ऐन शुरू से ही अलहदा और ‘आउटस्पोकन’ (बेलाग) रहे हैं। उनकी आत्मकथा (‘एंड देन वन डे’) मेरे द्वारा पढ़ी गई सर्वश्रेष्ठ किताबों में शुमार है। यह किसी ‘घोस्ट-राइटर’ की कृति नहीं, जैसी कि अनेक सेलेब्रिटी-बायोग्राफ़ीज़ होती हैं। उस किताब का प्रिसाइस-डिक्शन, उच्चकोटि की अंग्रेज़ी, उसका मुहावरा, उसका अंदाज़े-बयां नसीर साहब का ख़ुद का है। कहते हैं ऊँचे पाये की प्रतिभा के साथ ही एक अजीब किस्म की बहादुर-बेबाकी भी आती ही है। वह नसीर साहब में हमेशा से रही है।
इधर भी नसीर साहब ने सधे हुए स्वर के साथ कुछ बहुत मार्के की बातें कही हैं। उन्होंने देश में सार्वजनिक-बौद्धिकता के पतन पर खेद जताया है, प्रश्नाकुल-स्वरों के दमन पर उन्होंने ग़ुस्से और बेचारगी से लड़खड़ाती आवाज़ के साथ अपना विरोध दर्ज़ कराया है। उन्होंने सत्ता से सवाल पूछे हैं। उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं थी, उलटे ऐसा करने के आज के दौर में बड़े ख़तरे हैं। बट नसीर इज़ टु बिग टु बी टेम्ड- वो इतने बुलन्द-क़द हैं कि उन्हें चुप नहीं कराया जा सकता।
ललकारते हुए उन्होंने सवाल पूछा है कि जो आदमी हर चीज़ का श्रेय लेना चाहता है, वो किसी भी चीज़ की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता? क्या वो ख़ुदा है? देवता है? वो किसी भी सवाल का सामना क्यों नहीं करता? वो अपना एक गलदश्रु-पूर्ण, फ़र्ज़ी कल्ट-ऑफ़-डिविनिटी क्यों रच रहा है- मानो लोकतंत्र में लोग अपने प्रति जवाबदेह नेताओं को नहीं, आराध्यों और ईश्वरों को चुनते हों- जो केवल उपासना और असंदिग्ध-निष्ठा के पात्र हों?
नसीर साहब ने ‘जहालत’ लफ़्ज़ का इस्तेमाल करते हुए देश में वर्तमान में सर्वव्यापी बुद्धिहीनता की संस्कृति को भी आड़े हाथों लिया है। उन्होंने ठीक ही कहा है कि अगर मूर्खों के हाथों में सत्ता चली जाए तो वो बुद्धिमत्ता को प्रश्रय नहीं देने वाले, मूढ़ता को ही प्रसारित करेंगे। इसी में उनका न्यस्त-स्वार्थ है।
एक ओरिजिनल और टैलेंटेड आदमी जिस तरह की बातें करता है, वैसी ही नसीर साहब ने की हैं। हमेशा की हैं। अलबत्ता वो कभी-कभी फिल्म-उद्योग के कुछ सितारों को लेकर अतिशय आलोचनात्मक हो जाते हैं, यह समझे बिना कि हर आदमी के चरित्र और व्यक्तित्व के निर्माण की यात्रा होती है, उसकी एक गढ़न होती है, जो सालों-साल में ढलती है। और हर कलाकार से- इस परिप्रेक्ष्य में फिल्म-अभिनेताओं से- उनके जैसे प्रखर, मुखर, प्रबुद्ध और जुझारू होने की अपेक्षा रखना थोड़ी ज़्यादती है।
लेकिन अनुपम खेरों और अक्षय कुमारों जैसी बौनी-आवाज़ों के इस दौर में हमारे यहाँ एक नसीर साहब की ललकार भी है, यह कुछ कम दिलासे की बात नहीं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

