
- हेमंत कुमार झा
- क्या बिहार का प्रोफेसर समुदाय अपनी अस्मिता और अपने संस्थानों की स्वायत्तता की रक्षा कर पाएगा?
- बिहार की उच्च शिक्षा के संदर्भ में आज यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जरूरी है।
Bihar Higher Education : जैसा कि बताया जा रहा है, कॉलेज सरकार के सीधे अधीन हो जाने वाले हैं और प्रोफेसर लोग सरकारी बाबू हो जाने वाले हैं। सरकारी बाबू,यानी, ऐसा प्राणी जो सवाल नहीं कर सकता।
जो सवाल नहीं कर सकता, जो सरकार की नीतियों, राजनीति और समाज की दशा या दिशा पर खुल कर बोल या लिख नहीं सकता…वह कैसा प्रोफेसर?
खबरें आ रही हैं कि बिहार के विश्वविद्यालयों और उनके कुलपतियों के कार्यक्षेत्र अति सीमित हो जाने वाले हैं। अब वे अपने सीमित दायरे में पीजी की पढ़ाई करवाएंगे और शोध करवाएंगे। कॉलेज, जो उनकी अंगीभूत इकाई के रूप में उनके ही प्रांगण के विस्तार हैं, अब उनके दायरे से बाहर हो जाएंगे और कोई “जिला उच्च शिक्षा अधिकारी” होगा जो कॉलेजों का मार्गदर्शन और नियंत्रण करेगा।
वैसे ही, जैसे जिला शिक्षा पदाधिकारी होते हैं, जो जिला पदाधिकारी के सीधे अधीन होते हैं और जिनके माध्यम से सरकार के आदेशों का स्कूलों में पालन करवाया जाता है।
जाहिर है, जो भविष्य में जिला उच्च शिक्षा अधिकारी होगा वह भी जिला पदाधिकारी के सीधे अधीन होगा।
यानी, अगर बिहार सरकार की प्रस्तावित योजना क्रियान्वित होगी तो जिला भर के तमाम प्रोफेसरान जिला पदाधिकारी के सीधे अधीन होंगे और प्रखंड से लेकर अनुमंडल स्तर तक के हर प्रशासनिक अधिकारी का दखल कॉलेजों में होने लगेगा।
यानी, अभी जो अंगीभूत कॉलेजों के प्राचार्य सीधे कुलपति को रिपोर्ट करते हैं, अब न जाने किस किस अधिकारी को रिपोर्ट करेंगे। कोई सनकी जिला पदाधिकारी होगा तो वह जिला उच्च शिक्षा अधिकारी से इतनी तरह के और इतनी सारी रिपोर्ट्स तलब करेगा कि विवशता हो जाएगी कि कॉलेजों में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी स्तर का भी आ आ कर प्रिंसिपल और प्रोफेसरों का न सिर्फ माथा खराब कर दे बल्कि उनकी मिट्टी भी पलीद कर दे।
तब, प्रोफेसर क्या पारंपरिक अर्थों में प्रोफेसर बने रह पाएंगे?
बिल्कुल नहीं रह पाएंगे। जिन भी राज्यों में सरकारी बाबू के रूप में कार्यरत सरकारी टाइप के कॉलेजों के प्रोफसर लोग हैं, उनकी सेवा शर्तों का और उनके मानस लोक का अध्ययन कर लेना चाहिए। और, उसकी तुलना बिहार के प्रोफेसरों की सेवा शर्तों और उनकी बौद्धिक, अकादमिक स्वायत्तता से कर लेनी चाहिए। हमें देश के किसी भी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के शिक्षकों के समान वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार हासिल हैं।
कई राज्यों में सरकार नियंत्रित कॉलेजों में सेवा निवृत्ति आयु 60 वर्ष ही है क्योंकि सरकारी नौकरी में यही प्रावधान है जबकि बिहार में यूजीसी नियमों के तहत 65 वर्ष है। जो संकेत हैं, बिहार के प्रस्तावित संशोधनों में अन्य कई राज्यों के सरकार नियंत्रित कॉलेजों की तुलना में भी यहां के कॉलेज शिक्षकों के अधिकार सीमित कर दिए जाने वाले हैं। अभी तक, बिहार की उच्च शिक्षा का माहौल भले ही शिक्षकों का मान घटाने वाला हो, यहां की सेवा शर्ते कॉलेज शिक्षकों का मान बढ़ाने वाली रही हैं।
ठीक है कि हमें, यानी कि बिहार के प्रोफेसरों को नियमित यानी कि महीने की पहली तारीख को पगार नहीं मिल पाती, अक्सर अन्य सुविधाओं के लिए भी प्रतीक्षा करनी पड़ जाती है, लेकिन हम चाहे कॉलेज में नियुक्त हों या विश्वविद्यालय विभाग में, हम प्रोफेसर हैं और एक समान हैं।
नियुक्ति की प्रक्रिया, पात्रता, योग्यता, प्रतिष्ठा, सुविधा, सेवा शर्त, प्रोन्नति के अवसर आदि तमाम मानकों पर हम एक समान हैं। कभी कोई किसी कॉलेज से ट्रांसफर होकर विभाग में पदस्थापित हो जाता है कभी किसी विभाग से ट्रांसफर होकर किसी कॉलेज में कोई पदभार संभाल लेता है। वेतन की नियमितता में अगर अक्सर बाधा उत्पन्न होती है तो इसका भी मूल कारण सरकार के स्तर पर प्रशासनिक ढिलाई है जिन्हें पूरा अधिकार है कि वे विश्वविद्यालय के वित्तीय कामकाज का निरीक्षण कर सकें।
विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर दोषारोपण कर कॉलेजों का नियंत्रण सीधे अपने अधीन लाने की कवायद का कोई प्रभावी तर्क नहीं है। हालांकि, जैसी खबरें आ रही हैं, बिहार की सरकार नियंत्रण की इस तैयारी में लगी है।
अब, विश्वविद्यालय और उसके विभाग अलग होंगे…कॉलेज किसी अन्य ग्रह पर किसी अलग एटमॉस्फियर का संस्थान होगा।
विश्वविद्यालय विभाग के प्रोफेसर खुल कर अपनी बातें रख सकेंगे, राजनीति की दशा और दिशा पर अपने मंतव्य रख सकेंगे, चाहें तो बाकायदा राजनीति में भी उतर सकेंगे, शोध करवा सकेंगे, शोध प्रोजेक्ट हासिल कर सकेंगे…और…सबसे बड़ी बात…समय, समाज और सत्ता की आँखों में आँखें डाल कर उनसे सवाल कर सकेंगे।
इधर, जैसा कि अखबारों में देखा, डिग्री कॉलेजों के प्रोफसर लोग शोध का निर्देशन भी नहीं कर सकेंगे। पता नहीं, तब वे केंद्रीय या अन्य संस्थानों से मिलने वाले शोध प्रोजेक्ट भी हासिल कर पाएंगे या नहीं। प्रोमोशन के स्कोप तो सिमटेंगे ही, इसमें कोई संदेह नहीं।
बिहार सरकार ने उच्च शिक्षा संरचना में प्रस्तावित बदलावों का जो भी मसौदा तैयार किया होगा वह अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। जब तक सार्वजनिक नहीं होगा, तरह तरह के संदेह, तरह तरह की आशंकाएं प्रोफेसर समुदाय को आतंकित करती रहेंगी।
लेकिन, एक बात तो तय है कि प्रस्तावित संशोधन या नियमन कॉलेज प्रोफेसरों को सवाल करने की छूट नहीं देने वाला।
जो सवाल नहीं कर सकता, जो सवाल नहीं उठा सकता वह कैसा प्रोफेसर?
फिर, उनका क्या होगा जो इस पद की गरिमा, प्रतिष्ठा और बौद्धिक-वैचारिक स्वायत्तता से आकर्षित हो अपनी अच्छी खासी सरकारी सेवा को छोड़ इस नौकरी में आए?
न जाने कितने लोग, जो बिहार सरकार में बीडीओ, सीओ, डिप्टी कलेक्टर, पुलिस अधिकारी या राष्ट्रीयकृत बैंकों में मैनेजर, सीनियर मैनेजर,केंद्रीय सेवाओं में अच्छे पद पर…आदि आदि थे उन्होंने अवसर मिलने पर अपनी नौकरी छोड़ दी और विश्वविद्यालय सेवा में आ गए। वे जानते थे कि इसमें वेतनमान भले हो उच्चतम हो, लेकिन ठाठ बाट और ठसक सरकारी ओहदों वाली नहीं है। तब भी वे आए और खूब खुशी और संतोष के साथ आए।
सरकारी ओहदों की ठाठ बाट छोड़ ऐसे लोग क्यों बिहार में प्रोफेसर की नौकरी में आए?
क्योंकि उनके भीतर कोई बेचैनी थी, कुछ ऐसा डिलिवर करने का उत्साह और माद्दा था जो प्रोफेसर बन कर ही संभव हो सकता था। वे आए और आज हम देख सकते हैं कि वे डिलीवर कर पा रहे हैं। ठीक है कि यहां के परिसरों में व्याप्त भ्रष्टाचार, कॉकस के षड्यंत्रों, गलत लोगों की ऊंचे पदों पर पहुंच आदि से वे दुखी हैं, कई संदर्भों में त्रस्त भी हैं। लेकिन, वे महसूस करते हैं कि अगर वे चाहें तो वे सवाल कर सकते हैं। किसी से भी सवाल। चाहे वह राज्य का शिक्षा मंत्री ही क्यों न हो, यहां तक कि देश का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो।
सवाल करने का अधिकार, अपनी वैचारिकी को व्यक्त करने का अधिकार व्यक्तित्व को जो बौद्धिक आभा देता है वह किसी ठाठ बाट से नहीं मिल सकता। यही कारण है कि इस आभा से आकर्षित हो न जाने कितने मेधावी लोग इस सेवा में आए, न जाने कितने लोगों ने मैट्रिक पास करते ही यह सपना देखना शुरू किया कि एक दिन वे प्रोफेसर बन जाएं।
ऐसा सपना देखने वालों में से बहुत सारे लोग प्रोफेसर बन भी गए। अब, उन्हें कहा जाएगा कि सवाल करना भूल जाओ, राजनीति और समाज पर टीका टिप्पणियां करना भूल जाओ। अपनी औकात में रहो। सिलेबस कम्प्लीट करो, घर जाओ और एक दिन बूढ़े होकर रिटायर कर जाओ। पेंशन तो पहले ही छीनी जा चुकी है। स्वायत्तता और वैचारिक स्वतंत्रता की जो गरिमा थी वह भी अब छीन रहे हैं।
एक बड़ी जमात से वैचारिक स्वतंत्रता को छीन लेने की योजना, उनकी बौद्धिक आभा को कुन्द कर देने का षड्यंत्र क्यों हो रहा है?
इस सवाल के उत्तर के कई आयाम हैं। जब हम इनकी गहराइयों में उतरेंगे तो हमें सत्ता-संरचना के मनोविज्ञान का विश्लेषण करना होगा।
बावजूद राजनीतिक तटस्थता के, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह राजनीतिक उद्देश्यों से संचालित फैसला है और ऐसी सत्ता संरचना के द्वारा क्रियान्वित किए जाने का प्रयास है जो सवालों का सामना नहीं करना चाहती। हम एक ऐसे प्रधानमंत्री के साये तले पनपने वाली बिहार सरकार के प्रांगण में हैं जिसने पद संभालने के बाद कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस का सामना नहीं किया। जो सवालों से परहेज ही नहीं करता बल्कि बाकायदा सवालों से डरता है, जिसके भक्तगण सवाल पूछने वाले बौद्धिकों को “अर्बन नक्सल” कह देने के कुसंस्कार डेवलप कर चुके हैं, जिसके दौर के मीडिया की विश्वसनीयता रसातल में पहुँच चुकी है और दुनिया के स्तर पर अपना मुंह काला करवा कर 157 वीं रैंक की तलहटी में कहीं मुंह छुपाए है।
जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि से प्रधानमंत्री आते हैं उसके लोग सोचते हैं कि आने वाले कई दशकों तक उनका ही राज रहने वाला है। तो, अपने राज को सवालों से जितना भी दूर कर सको, उन्हें यह सब करना ही है। वे समावेशी और जवाबदेह लोकतंत्र के प्रवक्ता या वाहक नहीं, एकायामी वैचारिकी और उसकी तानाशाही के प्रतीक हैं।
गर्दन झुकाए, लचीली रीढ़ की हड्डी को बाकायदा अर्द्धचंद्राकार मुद्रा में किए शिक्षक ही उन्हें चाहिए, सरकारी कारिंदों को तो चाहिए ही चाहिए, क्योंकि खुद वे इसी मनोविज्ञान से प्रेरित प्रशिक्षित होते हैं। एक साथ हजारों कॉलेज शिक्षकों से उनकी वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के उनके अधिकार छीनने की कवायद कोई मामूली प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि यह पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला युगांतरकारी कदम है।
बिहार के हर कोने से प्रोफेसर समुदाय के विरोध की आवाजें उठ रही हैं।
सवाल है कि क्या यह विरोध इतना प्रभावी हो पाएगा कि सत्ता के इस षड्यंत्र का सामना कर सके। अच्छे वेतनमान और सुरक्षित सेवा ने उनमें एकजुट होकर अपनी गरिमा के लिए उठने और लड़ने के जज्बे को कम किया है। चमचे, खुशामदी, किसी भी छोटे मोटे लाभ के लिए अपनी गरिमा को भूल घिघियाते किस्म के प्रोफेसरों ने परिसरों में जो सड़ांध पैदा की है उसके दुर्गंध से माहौल में बौद्धिकता और वैचारिकता तो लुप्त होती ही गई है, सामूहिकता की भावना भी नष्टप्राय होती गई है।
नवउदारवादी, उपभोक्तावादी संस्कृति वैसे भी विचारों के स्तर पर नपुंसक सुविधाभोगियों को ही जन्म देती है जहां अपने पेशागत आत्मसम्मान और गरिमा के लिए खड़े होने वाले लोग इक्के दुक्के ही नजर आते हैं। इस माहौल ने शिक्षक संगठनों को कमजोर किया है, उनकी तेजस्विता का हरण किया है और समुदाय की एकजुट संघर्ष क्षमता को कुंद किया है।
लड़ाई आसान नहीं है। खास कर तब जब सामने जिससे बात की जाए उसके बारे में आइडिया ही न हो कि यह किस हद तक निर्णय लेने की शक्ति रखता है और किस हद तक एक मोहरा मात्र है।
ऐसी परिस्थिति में, किसी भी प्रत्यक्ष या किसी भी परोक्ष शक्ति के ऐसे षड्यंत्रों से जूझने का एकजुट जज्बा होना चाहिए जो प्रोफेसर समुदाय की गरिमा, उनकी वैचारिक स्वतंत्रता और बौद्धिक आभा छीनने पर आमादा है। आज बिहार के प्रोफेसर समुदाय का आत्मसम्मान उसकी एकजुट संघर्ष क्षमता की कसौटी पर है। हमारे पूर्ववर्तियों ने संघर्षों का इतिहास बनाया है, हमारी पीढ़ी को सम्मान, सुरक्षा और संस्कार की विरासत सौंपी है। क्या हमारी पीढ़ी इसे खो देगी?

