
अशोक पांडेय
भीड़-भड़क्के और दावत-पार्टी से दूर रहने वाले एकांतप्रेमी किशोर कुमार पेड़ों से मोहब्बत करते थे और अल्फ्रेड हिचकॉक की हॉरर फिल्मों के दीवाने थे। अपने बगीचे में लगे पेड़ों को उन्होंने बुद्धूराम, जनार्दन, गंगाधर, रघुनंदन और जगन्नाथ जैसे नाम दे रखे थे और वे उन्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त गिनते थे। 1975 में जब इमरजेंसी लगी तो इंदिरा गांधी ने अपनी नीतियों को लेकर बीस-सूत्रीय कार्यक्रम बनाया और उसके प्रचार के लिए अपने विश्वासपात्र विद्याचरण शुक्ल को सूचना मंत्री बनाया।
विद्याचरण फिल्मों की ताक़त को पहचानते थे और बंबई में उनके बहुत से फ़िल्मवालों के साथ नज़दीकी सम्बन्ध थे। वह तानाशाही का दौर था और जैसा कि ऐसे समय में होता है, सत्ता के किसी भी विचार से असहमत होना कलाकार के करियर के लिए घातक होता है। पहले किशोर कुमार को बंबई में यूथ कांग्रेस की एक रैली में गाने को कहा गया। उन्होंने साफ़ मना कर दिया।
विद्याचरण शुक्ल चाहते थे कि इन्दिरा गांधी और उनके बीस-सूत्रीय कार्यक्रम की प्रशंसा में गीत लिखे जाएं जिन्हें उस समय के बड़े गायकों से गवाया जाए। शुक्ल के आदेश पर सूचना मंत्रालय के कुछ अफसर इस सिलसिले में किशोर कुमार से मिलने बम्बई गए। किशोर कुमार को बताया गया कि मंत्रालय के आदेश के अनुसार उन्हें फलां-फलां गीत गाने होंगे। किशोर ने गालियां देते हुए इन अफसरों को अपने घर से भगा दिया। अपनी सत्ता का अपमान हुआ देख सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों ने देश के सबसे महबूब गायक को सबक सिखाने का फ़ैसला किया। लिखित आदेश जारी किये गए कि इस ‘अपराध’ की सज़ा के तौर पर आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के गाये सभी गीतों के प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। जिन फ़िल्मों में किशोर ने अभिनय किया था, उन्हें भी निशाने पर ले लिया गया।
इसके अलावा यह भी आदेश दिया गया कि किशोर कुमार के गीतों के ग्रामोफोन रेकॉर्ड्स की बिक्री पर रोक लगा दी जाए।
अफसरशाही समझती थी कि उसके आदेश से सारी फ़िल्म इंडस्ट्री में डर पैदा होगा और विरोध की संभावना समाप्त हो जाएगी। हालांकि ज़्यादातर कलाकारों ने डर के मारे चुपचाप सब कुछ मान लिया, सरकार के विरोध में बोलने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई। देव आनंद, विजय आनंद, राजकुमार, वी शांताराम, उत्तम कुमार और सत्यजित रे जैसे लोगों ने झुकने से मना कर दिया। सत्यजित रे ने तो इंदिरा गांधी के उस प्रस्ताव तक को ठुकरा दिया जिसके तहत उन्हें जवाहरलाल नेहरू पर बनने वाली एक फिल्म का निर्देशन करना था।
उन दिनों कलाकारों के पास अपने काम को जनता के पास ले जा सकने के रास्ते सीमित थे। ऐसे में सरकार के सामने न झुकने वाले जिन मुठ्ठी भर लोगों ने अपनी रीढ़ की हड्डी को साबुत बचाए रखा, किशोर कुमार उनकी पहली पांत में थे।
आज उनका जन्मदिन पड़ता है…!!

